
नई दिल्ली. पेगासस को लेकर छिड़े विवाद पर केंद्रीय सूचना एवं प्रोद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बयान दिया। उन्होंने कहा, कल रात एक वेब पोर्टल ने सनसनीखेज रिपोर्ट पब्लिश की। इसमें कई आरोप लगाए गए। संसद के मानसून सत्र के महज एक दिन पहले ऐसा करना महज संयोग नहीं हो सकता है। वहीं पेगासस मुद्दे पर फैलाई जा रही अफवाहों पर पीआईबी फैक्ट चेक की तरफ से एक ट्वीट आया, जिसमें बताया गया कि एनडीटीवी ने केंद्रीय मंत्री के बयान को गलत तरीके से पेश किया।
पीआईबी ने बताया गलत खबर का सच
पीआईबी फैक्ट चेक ने बताया कि एनडीटीवी की तरफ से किया गया दावा फेक है। पीआईबी पोस्ट के मुताबिक, एनडीटीवी ने दावा किया कि आईटी मिनिस्टर ने कहा कि निगरानी के लिए पेगासस के इस्तेमाल का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है। पीआई फैक्ट चेक ने कहा कि ये दावा फर्जी है। एनएसओ की प्रतिक्रिया का हवाला देते हुए मंत्री ने कहा, इसका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है जो ये बताए की डाटा का इस्तेमाल सर्विलेंस के लिए हुआ है।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव का पूरा बयान
सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री ने बताया कि पेगासस बनाने वाली कंपनी एनएसओ ने भी साफ कहा है कि जो दावे आपको प्रदान किए गए हैं, वे बुनियादी जानकारी से लीक हुए डेटा की भ्रामक व्याख्या पर आधारित हैं, जैसे कि एचएलआर लुकअप सेवाएं, जिनका पेगासस या किसी अन्य एनएसओ प्रोडक्ट्स के ग्राहकों के लक्ष्यों की सूची से कोई लेना-देना नहीं है।
"ऐसी सेवाएं किसी के लिए भी, कहीं भी, और कभी भी खुले तौर पर उपलब्ध हैं और आमतौर पर सरकारी एजेंसियों के साथ-साथ दुनिया भर में निजी कंपनियों द्वारा उपयोग की जाती हैं। यह भी विवाद से परे है कि डेटा का निगरानी या एनएसओ से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए यह सुझाव देने के लिए कोई तथ्यात्मक आधार नहीं हो सकता है कि डेटा का उपयोग किसी भी तरह निगरानी के बराबर है।"
पूरा विवाद कहां से शुरू हुआ?
पेरिस की संस्था फॉरबिडन स्टोरीज और एमनेस्टी इंटरनेशनल के पास करीब 50 हजार फोन नंबर्स की एक लिस्ट है। संस्था का दावा है कि ये नंबर पेगासस स्पायवेयर के जरिए हैक किए गए हैं। दोनों संस्थानों ने इस लिस्ट को दुनिया के 16 मीडिया संस्थानों के साथ शेयर किया। इसमें भारत भी शामिल था। द वायर नाम के न्यूज पोर्टल ने खुलासा किया कि जिन लोगों की जासूसी की गई, उनमें 300 भारतीय हैं, जिसमें 40 पत्रकार शामिल हैं।
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