
नई दिल्ली/लखनऊ. हाथरस केस में बड़ा खुलासा हुआ है। प्रवर्तन निदेशालय की शुरुआती जांच में पता चला है कि जातीय हिंसा फैलाने के लिए पीएफआई के पास 50 करोड़ रुपए आए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पैसा मॉरिशस से आया था। पूरी फंडिंग 100 करोड़ से अधिक रुपए की थी। फिलहाल मामले की जांच जारी है।
क्या है पीएफआई?
पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया को चरमपंथी इस्लामिक संगठन माना जाता है। यह खुद को पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के हक में आवाज उठाने वाला सगठन बताता है। 2006 में इस संगठन की स्थापना नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट (NDF)के उत्तराधिकारी के रूप में हुई। इस संगठन का मुख्यालय दिल्ली के शाहीन बाग में है। मुस्लिम संगठन होने के चलते इसकी गतिविधियां मुस्लिमों के आस पास मानी जाती हैं।
23 राज्यों में सक्रिय है पीएफआई?
मौजूदा वक्त की बात करें तो पीएफआई 23 राज्यों में अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। हालांकि, इसकी कार्यप्रणाली पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद संगठन खुद को न्याय, स्वतंत्रता और सुरक्षा का पैरोकार बताता है।
पीएफआई का विवादों से है पुराना नाता
1977 में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का गठन हुआ था। इसपर 2006 में बैन लगा था। इसके तुरंत बाद पीएफआई का गठन किया गया। दोनों संगठन की कार्यप्रणाली भी एक जैसी है। इसमें ज्यादातर सदस्य वही हैं, जो सिमी से जुड़े थे। ऐसे में विरोधी पीएफआई को सिमी का दूसरा विंग कहते हैं।
इस संगठन को बैन करने की मांग 2012 में भी उठी थी। लेकिन उस वक्त केरल सरकार ने पीएफआई का समर्थन किया था।
केरल पुलिस ने इसके बाद कुछ पीएफआई कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्तार किया था, इनके पास से बम, हथियार, सीडी और तमाम ऐसे दस्तावेज जब्त किए गए थे, जिनसे ये अल कायदा और तालिबान से प्रभावित नजर आ रहे थे।
2016 में एनआईए ने केरल के कन्नूर से आतंकी संगठन आईएस से प्रभावित अल जरूल खलीफा ग्रुप का खुलासा किया था। इसे देश के खिलाफ जंग छेड़ने और समुदायों को आपस में लड़ाने के लिए बनाया गया था। बाद में एनआईए को जांच में पता चला कि गिरफ्तार किए गए ज्यादातर सदस्य पीएफआई से थे।
इसी साल फरवरी में नागरिकता कानून के विरोध में दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में हुए दंगों में भी पीएफआई का हाथ बताया गया था। इतना ही नहीं पीएफआई ने दंगों के लिए फंडिंग भी की थी। इस दौरान पीएफआई के कई कार्यकर्ता भी गंभीर आरोपों को लेकर गिरफ्तार हुए थे।
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