
मुंबई. महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के बाद सरकार गठन पर पेंच फंसा हुआ है। दूसरी तरफ लगातार शिवसेना अपने मुखपत्र सामना में भाजपा पर निशाना साधे हुए है। महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के बाद सामना में लिखा गया कि हम नहीं तो कोई नहीं, चुनावी नतीजों के बाद जो यह अहंकारी दर्प चढ़ा है, ये राज्य के हित में नहीं है। महाराष्ट्र की जनता द्वारा दिए आदेश का पालन नहीं हो रहा है और यह जनादेश का अपमान है।
"भाजपा विरोध में बैठने को तैयार है"
भारतीय जनता पार्टी विरोधी पक्ष में बैठने को तैयार है। इसका मतलब कांग्रेस और राष्ट्रवादी का साथ देने को तैयार हैं, ऐसा कहा जाए तो उन्हें मिर्ची नहीं लगनी चाहिए। दिए गए वचन पर भाजपा कायम रहती तो परिस्थिति इतनी विकट न होती। शिवसेना से जो भी तय हुआ है, वो नहीं देंगे भले हमें विरोधी पक्ष में बैठना पड़े, ये दांव-पेच नहीं बल्कि शिवसेना को नीचा दिखाने का षड्यंत्र है।
"इस खेल को महाराष्ट्र की जनता देख रही है"
किसी भी परिस्थिति में महाराष्ट्र में सत्ता स्थापना नहीं होने देना और राजभवन के पेड़ के नीचे बैठकर पत्ते पीसते बैठने के खेल को महाराष्ट्र की जनता देख रही है। कांग्रेस या राष्ट्रवादी के साथ हमें क्या करना है, ये हम देख लेंगे।
"हम नीलकंठ बनने के लिए तैयार"
भाजपा के साथ अमृत पात्र से निकले विष को महाराष्ट्र की अस्थिरता को मिटाने के लिए हम नीलकंठ बनने को तैयार हैं। यदि हिंदुत्व की भाषा में कहा जाए तो जिस हलाहल का प्राशन भगवान शंकर ने किया, उसी शिव की भक्ति शिवराय ने की और शिवराय की पूजा शिवसेना ने की है। महाराष्ट्र की जनता को हकीकत मालूम है इसलिए हमने विश्वासपूर्वक कुछ कदम उठाए हैं। शिवसेना ने सत्ता स्थापना का दावा किया। समर्थन के लिए आवश्यक कागजात समय पर नहीं पहुंच सके। 105 वालों को जब सफलता नहीं मिली तो अगला कदम उठानेवालों को ये समझना ही चाहिए। इसका मतलब सिर्फ 105 वाले ही जल्लोष मनाएं, ऐसा नहीं है। मेरा चंदन मैंने ही पोंछा लेकिन दूसरे का सौभाग्य मिटने की खुशी मनानेवालों की विकृति महाराष्ट्र के सामने है। हम गत कुछ वर्षों से ऐसे कई कटु अनुभवों से गुजर रहे हैं। राज्य में सत्ता का पेच भले ही हो लेकिन वो छूटेगी।
व्यवस्ता का दुरुपयोग और मनमानी
महाराष्ट्र में 24 तारीख से ही सत्ता स्थापना का मौका होने के बावजूद 15 दिनों में भाजपा ने कोई प्रयास नहीं किया। मतलब भाजपा ने सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद कोई हलचल नहीं की और शिवसेना को 24 घंटे भी नहीं मिले, ये कैसा कानून? विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्र में थे और कई राज्य के बाहर थे। कहा गया कि उनके हस्ताक्षर लेकर आओ वो भी सिर्फ 24 घंटों में। व्यवस्था का दुरुपयोग और मनमानी इसे ही कहते हैं।
सिर्फ 24 घंटे का समय मिला
किसी भी दो या तीन दलों में समन्वय हुए बिना सत्ता नहीं बन पाएगी, ये जानते हुए भी राजभवन से सिर्फ 24 घंटों की मोहलत मिली। उसके बाद 105 वालों की खुशी व्यक्त करने के दृश्य देखने को मिले, जो कि ठीक नहीं है। सत्ता स्थापना होने की बजाय सत्ता स्थापना न होने में ही कुछ लोगों को खुशी मिल रही है। खुशी किस बात की होनी चाहिए? दिए गए वचन को निभाने में खुशी मनाई जानी चाहिए या महाराष्ट्र को अस्थिरता की खाई में धकेलने पर खुशी मनाई जानी चाहिए, ये उन्हें ही तय करने दो। जनता सर्वसाक्षी है। शिवसेना किस दिशा में कदम बढ़ा रही है इस पर टीका-टिप्पणी होने दो। कश्मीर में महबूबा और बिहार में नीतीश कुमार का घरौंदा बसाते समय तत्व और विचारों का क्या हुआ? बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव को जनादेश था। उस जनादेश को तोड़-मरोड़कर भाजपा और नीतीश कुमार में बन ही गई न! हमें नीतीश कुमार की चिंता है। महाराष्ट्र में स्थिर शासन आए और जल्द-से-जल्द आए, महाराष्ट्र के हित और जनता के कल्याणार्थ सब अच्छा हो मां जगदंबा के चरणों में यही प्रार्थना!
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