
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने को लेकर बुधवार को सुनवाई हुई। आर्टिकल 370 से जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा मिला हुआ था। पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार ने इसे हटा दिया और जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया था।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत की 5 जजों वाली संविधान पीठ इस संबंध में दायर याचिकाओं पर सुनवाई की। याचिकाओं में 5 अगस्त 2019 के राष्ट्रपति के आदेश को चुनौती दी गई हैं, जिसने अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में कहा कि जब भारत गणतंत्र बना उससे पहले से जम्मू-कश्मीर में धारा 370 लागू थी। संविधान सभा 1951 में अस्तित्व में आई। इसलिए यह तर्क गलत है कि अनुच्छेद 370 अस्थायी था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में रोजाना सुनवाई होने वाली है।
उमर अब्दुल्ला ने जताई न्याय मिलने की उम्मीद
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के प्रमुख उमर अब्दुल्ला ने उम्मीद जताई है कि सुप्रीम कोर्ट से उन्हें न्याय मिलेगा। उमर अब्दुल्ला सुनवाई के लिए दिल्ली आए हैं। उमर अब्दुल्ला ने कहा, "हम जम्मू-कश्मीर के लोगों की उस उम्मीद के साथ यहां आए हैं कि हम साबित कर सकते हैं कि 5 अगस्त, 2019 को जो हुआ वह असंवैधानिक और अवैध था। हमें उम्मीद है कि न्याय मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट में लगाई गईं हैं 23 याचिकाएं
जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 23 याचिकाएं लगाई गईं हैं। संविधान पीठ ने सभी पक्षों से 25 जुलाई तक ऑनलाइन मोड में अपना जवाब देने को कहा था। पीठ ने कहा कि मामले से जुड़ी सभी फाइलें और दस्तावेज पेपरलेस मोड में जमा किए जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह जम्मू-कश्मीर के हालात को लेकर केंद्र की ओर से दाखिल ताजा हलफनामे पर सुनवाई नहीं करेगा।
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केंद्र सरकार ने सोमवार को हलफनामा दायर कर बताया था कि अनुच्छेद 370 हटाने से राज्य में स्थिरता आई है और प्रगति हुई है। संविधान पीठ ने कहा कि वह सिर्फ संवैधानिक मुद्दों पर ही सुनवाई करेगी। पीठ ने कहा, "हम केवल संवैधानिक मुद्दों पर सुनवाई करेंगे। केंद्र के नए हलफनामे का इस मामले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।"
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