
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने फिर से इलाहाबाद हाईकोर्ट की आलोचना की है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले उस जज को फटकार लगाई थी जिसने यह टिप्पणी की थी कि छाती को छूने या पायजामा के नाड़े को खींचने को बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक और मामले में पीड़िता को दोषी ठहराने के लिए आलोचना की।
एक नाबालिग लड़की के बलात्कार के मामले में आरोपी को जमानत देते हुए कोर्ट ने कहा कि लड़की ने खुद मुसीबत को बुलावा दिया था। सुप्रीम कोर्ट के जज बी आर गवई ने पूछा कि इस तरह की टिप्पणी क्यों की गई। जस्टिस गवई ने कहा कि जजों को टिप्पणी करते समय सतर्क रहना चाहिए।
"जमानत दी जा सकती है। लेकिन ऐसी टिप्पणियां क्यों की जाती हैं? क्या यहां यह चर्चा हो रही है कि उसने खुद मुसीबत को बुलावा दिया? इस तरह बोलते समय ध्यान रखना चाहिए"- जस्टिस गवई ने कहा।
बच्चों की तस्करी से जुड़े एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सभी आरोपियों को जमानत देने के फैसले की भी सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आलोचना की। आलोचना की गई कि हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया और लापरवाही से संभाला। इससे कई आरोपियों को छिपने का रास्ता मिल गया। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि ये आरोपी समाज के लिए बड़ा खतरा हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में आरोपियों को जमानत देते समय हफ्ते में एक बार पुलिस स्टेशन में हस्ताक्षर करने की शर्त रखनी चाहिए थी।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की भी आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य ने जिस तरह से इस स्थिति को संभाला उससे पूरी तरह से निराशा हुई है। कोर्ट ने पूछा कि राज्य ने कुछ क्यों नहीं किया? जमानत आदेश को चुनौती क्यों नहीं दी गई।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की उस विवादास्पद टिप्पणी पर रोक लगा दी थी जिसमें कहा गया था कि लड़की की छाती को छूना बलात्कार का प्रयास नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद टिप्पणी पर कड़ी नाराजगी जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने आलोचना की कि टिप्पणियां दर्दनाक हैं और हाईकोर्ट के जज की ओर से घोर लापरवाही हुई है।
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