
नई दिल्ली। अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में बेटियों की पात्रता के संबंध में अक्सर फैसले आते रहे हैं, लेकिन देश की शीर्ष अदालत (Surpeme court) ने एक मामले में
सरकारी कर्मचारी के निधन के बाद उसकी बेटी को अनुकंपा के आधार पर नौकरी (compassionate appointment) देने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बेटी नौकरी के लिए पात्र तो है, लेकिन इसके लिए उसे मां की मंजूरी चाहिए।
भाई अनफिट हुअ तो बहन ने किया था आवेदन
मामला मध्यप्रदेश का है। इस केस में मध्यप्रदेश पुलिस में कार्यरत एक कर्मचारी के निधन के बाद 2015 में उनके बेटे ने सब इंस्पेक्टर के पद पर अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। लेकिन पुलिसकर्मी का बेटा जांचों में अनफिट पाया गया। बेटे को अनुकंपा नियुक्ति के लिए उसकी मां ने आवेदन किया था, लेकिन उसे नौकरी नहीं मिल सकी। इसके बाद बेटी ने सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर दिया और नौकरी की मांग की। लेकिन मध्यप्रदेश सरकार के अनुकंपा नियुक्ति नियमों के मुताबिक पिता की जगह नौकरी के लिए मां की मंजूरी जरूरी है।
इस मामले में पेंच तब फंस गया जब मां ने बेटी को नौकरी देने की संस्तुति नहीं की। मां का कहना है कि बेटी ने संपत्ति के बंटवारे के लिए अदालत में केस दाखिल कर रखा है। यह मामला कोर्ट में विचाराधीन है। इसलिए उसने बेटी को नौकरी देने की संस्तुति नहीं की। इसी आधार पर विभाग ने बेटी की अर्जी खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने भी खारिज की अर्जी
अर्जी खारिज होने के बाद बेटी इस मामले को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (MP High court) पहुंची, लेकिन हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश पुलिस (नॉन गजटेड) सर्विस रूल्स 1997 की धारा 2.2 के आधार पर बेटी को मां की संस्तुति के बिना नौकरी देने से इंकार कर दिया। मप्र सर्विस रूल्स 1997 की धारा 2.2 के मुताबिक सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद आश्रित पति या पत्नी अनुकंपा नियुक्ति के योग्य नहीं है या खुद नौकरी नहीं चाहते तो बेटे या अविवाहित बेटी को नौकरी देने की संस्तुति कर सकते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं टिकी कोई दलील
हाईकोर्ट से मामला खारिज होने के बाद बेटी सुप्रीम कोर्ट पहुंची। उसकी तरफ से वकील दुष्यंत पाराशर ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के 2021 के कर्नाटक बनाम सीएन अपूर्वा जजमेंट में शादीशुदा बेटियों को भी अनुकंपा नियुक्ति की पात्र बताया गया है। मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस अजय रस्तोगी और सीटी रवि की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय में कुछ गलत नहीं है, लेकिन इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार के नियमोंं के विरुद्ध नहीं जाया जा सकता है। यह कहते हुए शीर्ष अदालत ने अर्जी खारिज कर दी।
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