
अगरतला। त्रिपुरा हाईकोर्ट (Tripura High court) ने मंगलवार को राज्य सरकार द्वारा विवाहित बेटियों को डाय-इन-हार्नेस (Die in harness)योजना के तहत अनुकंपा नियुक्ति से बाहर रखने को गलत बताया। कोर्ट ने इस सरकारी अधिसूचना को खारिज कर दिया, जिसमें विवाहित बेटियों को ऐसी नियुक्तियों से बाहर रखा गया था।
बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर करना असंवैधानि
चीफ जस्टिस इंद्रजीत महंती और एसजी चट्टोपाध्याय की बेंच ने कहा कि डाई-इन-हार्नेस योजना का उद्देश्य एक कमाने वाले परिवार के निधन के बाद तत्काल राहत प्रदान करना है। बेंच ने कहा- विवाह एक बेटी और उसके माता-पिता के बीच के बंधन को नहीं तोड़ता है। अपने माता-पिता के परिवार में संकट एक विवाहित बेटी को भी उतना ही चिंतित करता है, जितना कि बेटे को। इसलिए एक विवाहित बेटी को योजना से बाहर करने के पीछे कोई तर्क नहीं है। हाईकोर्ट की बेंच एकल न्यायाधीश के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसने फैसला सुनाया था कि त्रिपुरा सरकार द्वारा विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर करना असंवैधानिक था।
डाई इन हार्नेस नीति भेदभावपूर्ण
कोर्ट ने कहा कि विवाहित महिला को अनुकंपा नियुक्त के लिए अयोग्य मानने वाली डाई इन हार्नेस नीति भेदभावपूर्ण मानी जानी चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 14 से 16 की कसौटी पर परखी गई ऐसी नीति को वैध नहीं माना जा सकता। पीठ उच्च न्यायालय के एकल-न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ राज्य द्वारा एक अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें त्रिपुरा सरकार द्वारा मई 2017 की अधिसूचना को असंवैधानिक बताया गया था।
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चार अलग-अलग मामलों की एक साथ सुनवाई
दरअसल, हाईकोर्ट में इस संबंध में चार अलग-अलग मामलों की सुनवाई हो रही थी। इसमें सरकार ने चारों विवाहित बेटियों को नौकरी देने से इंकार कर दिया था। राज्य के वकील ने तर्क दिया कि इस योजना में विवाहित बेटी को इसलिए शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि उन्हें किसी भी स्थिति में मृत कर्मचारी के परिवार का आश्रित सदस्य नहीं माना जा सकता है। ऐसे में वे यह दावा करने का अधिकार नहीं रखती हैं।
याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला
इस पर याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि डाय इन हार्नेस योजना के तहत विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति के दायरे से पूरी तरह से बाहर करना अनुचित भेदभाव है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है। इस पर बेंच ने कहा कि अलग-अलग हाईकोर्ट ने सर्वसम्मति से देखा है कि विवाहित बेटियों को ऐसी योजनाओं के दायरे से पूरी तरह से बाहर करना अनुचित, मनमाना और संविधान के समानता खंड का उल्लंघन है, जैसा कि अनुच्छेद 14 से 16 में प्रदान किया गया है। अदालत ने कहा कि जहां मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार के सहयोग के लिए विवाहित बेटी के अलावा कोई नहीं हो, ऐसे मामलों में क्या करेंगे? कोर्ट ने इससे जुड़ी चार अलग-अलग अपीलों को एक साथ सुना और खारिज कर दिया। कोर्ट ने राज्य के अधिकारियों को प्रतिवादियों से प्राप्त अनुकंपा नियुक्ति के आवेदनों पर नए सिरे से विचार करने और तीन महीने के अंदर इन्हें निपटाने के आदेश दिए।
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केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले साल लागू किया है नियम
विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति को लेकर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने नवंबर में एक फैसला लिया था। इसके तहत सेवाकाल के दौरान यदि किसी कर्मचारी की मौत होती है तो उसकी विवाहित पुत्री भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार मानी जाएगी। इसके लिए कुटुंब की परिभाषा में भी बदलाव किया गया है। इससे पहले कुटुंब की परिभाषा में कर्मचारी के पति/पत्नी, अविवाहित पुत्र व पुत्री और विवाहित पुत्र ही शामिल थे। विवाहित पुत्री कुटुंब में शामिल नहीं थी। केंद्र सरकार ने भी विवाहित पुत्री को भी कुटुंब की परिभाषा में शामिल कर लिया है।
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