
प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट में मंगलवार को उत्तर प्रदेश के धर्मांतरण अध्यादेश के खिलाफ याचिका पर सुनवाई हुई। योगी सरकार ने इस याचिका पर जवाब देने के लिए कोर्ट से समय मांगा है। वहीं, कोर्ट ने राज्य सरकार को वक्त देते हुए 24 फरवरी को अगली सुनवाई का आदेश दिया।
वहीं, याचिकाकर्ता ने कहा, उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले को टालने के लिए बहानेबाजी कर रही है। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में धर्मांतरण अध्यादेश को रद्द करने की मांग की है।
अध्यादेश के दुरुपयोग की आशंका
योगी सरकार पिछले साल उत्तर प्रदेश विधि विरूद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020 अध्यादेश लाई है। इसमें जबरन या धोखे से धर्मांतरण कराए जाने और शादी करने पर दस साल की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा 50 हजार रुपए तक जुर्माना भी है।
याचिकाकर्ता ने इस अध्यादेश के दुरुपयोग की आशंका जताते हुए इस पर रोक लगाने की मांग की है। याचिकाओं में कहा गया है कि यह कानून व्यक्ति के अपनी पसंद व शर्तों पर किसी भी व्यक्ति के साथ रहने व धर्म/पंथ अपनाने के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है।
क्या कहना है सरकार का?
वहीं, योगी सरकार का कहना है कि शादी के लिए धर्म परिवर्तन से कानून व्यवस्था व सामाजिक स्थिति खराब हो रही है। इसे रोकने के लिए राज्य सरकार कानून लाई है। सरकार के मुताबिक, यह धर्मांतरण अध्यादेश पूरी तरह से संविधान सम्मत है। इसे मूल अधिकारों का हनन नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट से लगा झटका
इस मामले में राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। सरकार ने सभी याचिकाओं की सुनवाई एक साथ करने की अर्जी को खारिज कर दिया था। इसके बाद हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है।
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