
1971 का युद्ध भारतीय सेना की ताकत और मनोबल के आगे पाकिस्तान की हार का प्रतीक है। थल, नौसेना और वायुसेना ने अपनी शक्ति दुनिया के सामने प्रदर्शित की। बांग्लादेश के जन्म का कारण बने इस युद्ध की 53वीं वर्षगांठ पर देश वीर सैनिकों को याद कर रहा है।
दुनिया के इतिहास में सबसे छोटे युद्धों में से एक, यह केवल तेरह दिनों तक चला।1971 के युद्ध के अंत ने दुनिया को एक नए राष्ट्र, बांग्लादेश, का उदय भी दिखाया। पूर्वी क्षेत्र में पाकिस्तानी शासन के खिलाफ शुरू हुआ विद्रोह आगे चलकर भारत-पाक युद्ध का कारण बना। बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों की बढ़ती संख्या के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कठोर कदम उठाने का निर्देश दिया था।
इसके लिए इंदिरा गांधी ने रूस सहित कई देशों का समर्थन सुनिश्चित किया। युद्ध की तैयारी में जुटी थलसेना के बीच 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारत के ११ हवाई अड्डों पर हमला कर दिया, जिसके बाद भारत ने भी युद्ध की घोषणा कर दी। जमीन और आसमान में पाकिस्तान ने भारतीय सेना की ताकत का अहसास किया। उसी दिन ब्राह्मणबैरिया जिले के गंगासागर में पाकिस्तानी सेना के ठिकाने पर भारतीय सेना ने धावा बोल दिया। बंकर में छिपे पाकिस्तानी सैनिकों से लोहा लेते हुए लांस नायक अल्बर्ट एक्का सहित कई सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी, जिन्हें देश कभी नहीं भूलेगा।
परमवीर चक्र से सम्मानित लांस नायक अल्बर्ट एक्का को देश ने नमन किया। युद्ध में 90000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ ने पाकिस्तानी सेना को 'आत्मसमर्पण करो या हम तुम्हें मिटा दें?' का अल्टीमेटम दिया। इसके बाद पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आमिर अब्दुल्ला खान नियाजी और उनके सैनिकों ने भारत के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह युद्ध विजय इंदिरा गांधी की कूटनीतिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रमाण भी बना। कितना भी समय बीत जाए, यह विजय भारतीय इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित रहेगी।
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