कौन थे दादा साहेब फाल्के, जिनके नाम पर है फिल्मों का सबसे बड़ा अवॉर्ड; कहलाते हैं सिनेमा के पितामह

Published : Aug 06, 2022, 07:05 PM ISTUpdated : Aug 07, 2022, 02:48 PM IST
कौन थे दादा साहेब फाल्के, जिनके नाम पर है फिल्मों का सबसे बड़ा अवॉर्ड; कहलाते हैं सिनेमा के पितामह

सार

भारत इस साल अपनी आजादी का अमृत महोत्सव (Aazadi Ka Amrit Mahotsav) मना रहा है। 15 अगस्त, 2022 को भारत की स्वतंत्रता के 75 साल पूरे हो रहे हैं। बता दें कि आजादी से पहले ही भारत में फिल्मों का निर्माण होने लगा था। भारत में पहली फिल्म बनाने का श्रेय दादा साहेब फाल्के को जाता है, जिन्होंने 1913 में भारत की पहली फिल्म हरिश्चन्द्र बनाई। 

India@75:  भारत इस साल अपनी आजादी का अमृत महोत्सव (Aazadi Ka Amrit Mahotsav) मना रहा है। 15 अगस्त, 2022 को भारत की स्वतंत्रता के 75 साल पूरे हो रहे हैं। बता दें इस महोत्सव की शुरुआत पीएम नरेंद्र मोदी ने 12 मार्च, 2021 को गुजरात के साबरमती आश्रम से की थी। बता दें कि आजादी से पहले ही भारत में फिल्मों का निर्माण होने लगा था। हालांकि, इसमें तेजी आजादी के बाद आई। भारत की पहली फिल्म बनाने का श्रेय दादा साहेब फाल्के को जाता है, जिन्होंने 1913 में भारत की पहली फिल्म हरिश्चन्द्र बनाई। 
 
भारतीय सिनेमा के पितामह : 
दादासाहेब फाल्के को भारतीय सिनेमा का पितामह भी कहा जाता है। उनका जन्म 30 अप्रैल, 1870 को महाराष्ट्र के नासिक में एक मराठी फैमिली में हुआ था। दादा साहेब की पढ़ाई शिक्षा कला भवन, बड़ौदा से हुई। उन्होंने मुंबई के सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से एक्टिंग की ट्रेनिंग ली। वे शौकिया जादूगर भी थे। कहा जाता है कि उन्होंने क्रिसमस के मौके पर ‘ईसा मसीह’ पर बनी एक फिल्म देखी। इसको देखने के बाद ही उन्होंने ये फैसला कर लिया था कि वो भी फिल्म बनाएंगे। 

इस फिल्म से प्रेरित होकर बनाई भारत की पहली फिल्म : 
1910 में अमेरीका-इंडिया पिक्चर पैलेस में यीशु पर बनी मूवी ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ दिखाई गई थी। यह फिल्म देखने के बाद उनके दिमाग में ये विचार आया कि क्यों ना रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक महाकाव्यों की अच्छी कहानियों पर फिल्म बनाई जाए। इसके लिए वो करीब 3 महीने इंग्लैंड में रहे और वहां से फिल्मों में काम आने वाले कुछ इंस्टूमेंट भी खरीदकर लाए। इंग्लैंड से वो करीब 5 पौंड का एक सस्ता-सा कैमरा ले आए और इसके बाद मुंबई के अलग-अलग सिनेमाघरों में जाकर फिल्मों पर स्टडी करने लगे।

नहीं मिलीं महिला कलाकार तो पुरुषों ने ही किया काम : 
करीब दो महीने तक दादा साहेब फाल्के ने रोज चार से पांच घंटे फिल्में देखीं। उनके दिमाग में बस यही चीज चलती थी कि वो कैसे फिल्म बनाएं। लगातार काम करने की वजह से उनकी सेहत भी बिगड़ गई थी। इसके बाद 1912 में उन्होंने फिल्म 'हरिश्चंद्र' बनाने का फैसला किया। इस फिल्म के डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, लाइटमैन, कैमरा डिपार्टमेंट सबकुछ उन्होंने ही संभाला। यहां तक कि फिल्म के स्क्रिप्ट राइटर भी वही थे। इस फिल्म के लिए महिला कलाकार नहीं मिलीं, ऐसे में सभी पुरुषों ने ही काम किया। 

दादर के स्टूडियो में शूट हुई फिल्म : 
इस फिल्म की शूटिंग दादर के एक स्टूडियो में सेट बनाकर की गई। सारी शूटिंग दिन की रोशनी में ही होती थी। करीब 6 महीने की मेहनत के बाद 3700 फीट लंबी फिल्म बनकर तैयार हुई। इसके बाद 21 अप्रैल, 1913 को इसे ओलंपिया सिनेमा हॉल में रिलीज किया गया। सिनेमा बॉम्बे में रिलीज किया गया। यह भारत की पहली फिल्म थी। इस फिल्म की कामयाबी के बाद दादा साहेब फाल्के ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

दादा साहेब ने बनाईं ये मशहूर फिल्में : 
इसके बाद एक बिजनेसमैन के साथ मिलकर दादा साहेब फाल्के ने एक फिल्म कंपनी बनाई, जिसका नाम हिंदुस्तान फिल्म्स था। बाद में वो एक्टर के साथ-साथ टेक्नीशियनों को भी ट्रेनिंग देने लगे। हालांकि, 1920 में उन्होंने हिंदुस्तान फिल्म्स से इस्तीफा दे दिया। अपने फिल्मी करियर में उन्होंने एक से बढ़कर एक फिल्में बनाईं। इनमें मोहिनी भस्मासुर (1913), सत्यवान सावित्री (1914), लंका दहन (1917), श्री कृष्ण जन्म (1918), कालिया मर्दन (1919), भक्त प्रह्लाद (1926), रुक्मिणी हरण (1927), परशुराम (1928), वसंत सेना (1928) जैसी फिल्में बनाईं। उनकी आखिरी फिल्म गंगावतरण थी, जो 1937 में रिलीज हुई थी। 

दादा साहेब फाल्के के सम्मान में अवॉर्ड : 
दादा साहेब फाल्के के सम्मान में भारत सरकार ने 1969 में 'दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड' शुरू किया। यह भारतीय सिनेमा का सबसे सम्मानित पुरस्कार है। सबसे पहले यह पुरस्कार देविका रानी को मिला था। 1971 में भारतीय डाक ने दादा साहेब फाल्के के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया। 

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