
बेंगलुरु: पत्नी के अवैध संबंध के कारण पति द्वारा आत्महत्या करने के मामले में, हाईकोर्ट ने कहा है कि पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस आरोप में निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द करने की मांग करते हुए मांड्या जिले के मद्दूर तालुक निवासी प्रेमा और उसके प्रेमी बसवलिंगेगौड़ा द्वारा दायर आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति शिवशंकर अमरनारनवर की पीठ ने यह आदेश दिया।
उकसाने का मतलब है किसी विशेष काम को करने के लिए प्रेरित करना। तभी यह अपराध होता है। अपील करने वाले आरोपियों के बीच अवैध संबंध था। लेकिन, पति सदाशिवमूर्ति को आत्महत्या के लिए जानबूझकर उकसाया गया था, इसके पुख्ता सबूत होने चाहिए। ऐसे सबूत के बिना अपराध साबित नहीं हो सकता, हाईकोर्ट ने कहा। इसके साथ ही, निचली अदालत द्वारा प्रेमा और बसवलिंगेगौड़ा को दी गई क्रमशः तीन और चार साल की कठोर कारावास की सजा को रद्द कर दिया गया।
मामला क्या है: सदाशिवमूर्ति से शादी करने वाली प्रेमा का बसवलिंगेगौड़ा के साथ अवैध संबंध था। इसी बात को लेकर पति-पत्नी में झगड़ा होता रहता था। सदाशिवमूर्ति ने 15 जुलाई 2010 को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। 10 जुलाई 2010 को शाम 4 बजे सदाशिवमूर्ति के घर के सामने गए बसवलिंगेगौड़ा ने कहा था, 'तुम मर जाओ। फिर मैं और प्रेमा खुशी से जीवन बिताएंगे', ऐसा कहकर अपमानित किया था। इससे दुखी होकर सदाशिवमूर्ति ने आत्महत्या कर ली, ऐसा आरोप लगाया गया था।
मांड्या की अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायालय ने 1 जनवरी 2013 को प्रेमा और बसवलिंगेगौड़ा को सजा सुनाई थी। इसे चुनौती देते हुए आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा, 'आरोपियों द्वारा मृतक को यह कहना कि तुम जाकर मर जाओ, तुम्हारे मरने पर हम खुशी से जीवन बिताएंगे, आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं है। मृतक अपनी पत्नी और बसवलिंगेगौड़ा के अवैध संबंध को लेकर संवेदनशील था। इससे दुखी होकर उसने आत्महत्या की होगी।'
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