19 साल के NEET स्टूडेंट ने सिर्फ 10 मिनट में जीत लिया अपना केस, सुप्रीम कोर्ट हैरान

Published : Feb 15, 2026, 08:55 AM IST
supreme court

सार

12वीं पास 19 वर्षीय अथर्व चतुर्वेदी ने सुप्रीम कोर्ट में खुद अपना केस लड़ा और जीता। EWS कोटे के तहत NEET एडमिशन न मिलने पर उसने याचिका दायर की थी। कोर्ट ने 2025-26 सत्र के लिए उसके अंतरिम एडमिशन का निर्देश दिया।

नई दिल्लीः हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच में एक हैरान करने वाली घटना हुई। एक युवक ने सिर्फ दस मिनट तक बहस की और अपना केस जीत लिया। उसकी दलीलों को देखकर जज भी हैरान रह गए। वह न तो कोई वकील था और न ही कोई संविधान का जानकार। वह था मध्य प्रदेश के जबलपुर का 19 साल का अथर्व चतुर्वेदी, जिसने 12वीं पास की है! डॉक्टर बनने की चाह रखने वाले इस छात्र ने अपने साथ हुए अन्याय के बारे में कोर्ट को बताया और जीत हासिल की। दस मिनट की बहस के बाद उसकी जिंदगी ही बदल गई। उसने जो चाहा था, वो हासिल कर लिया!

खास अधिकार

उसने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले खास अधिकार का इस्तेमाल करते हुए खुद अपने केस की पैरवी की। असल में, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) से आने वाले इस युवक ने दो बार NEET परीक्षा पास की थी। लेकिन नियमों में कमी की वजह से उसे एडमिशन नहीं मिल पा रहा था। उसने इसी बात को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उसकी दलीलें और सबूतों को देखने के बाद जजों ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए एडमिशन से मना नहीं किया जा सकता क्योंकि राज्य ने प्राइवेट कॉलेजों में EWS आरक्षण को लेकर कोई नियम नहीं बनाया है। कोर्ट ने अधिकारियों को 2025-26 सेशन के लिए इस युवक को अंतरिम एडमिशन देने का निर्देश दिया।

कौन है अथर्व चतुर्वेदी?

अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी एक वकील हैं। लॉकडाउन के दौरान, जब कोर्ट की कार्यवाही वर्चुअल तरीके से चल रही थी, तो अथर्व उसे बड़े ध्यान से देखता था। वैसे, उसे वकील बनने का कोई शौक नहीं था। उसने मेडिकल और इंजीनियरिंग, दोनों की प्रवेश परीक्षा पास की थी। वह दो बार NEET पास कर चुका है, जिसमें उसने 530 अंक हासिल किए। लेकिन प्राइवेट कॉलेजों में EWS कोटे के तहत उसे MBBS की सीट नहीं मिली, क्योंकि राज्य ने वहां आरक्षण बढ़ाने की नीति लागू नहीं की थी। इसी को उसने चुनौती दी थी।

कोविड में सीखी कला

उसकी बोलने की कला को देखकर चीफ जस्टिस ने मजाक में कहा, 'तुम्हें डॉक्टर नहीं, वकील बनना चाहिए। तुमने गलत फील्ड चुन ली है।' बेटे की इस ऐतिहासिक जीत पर बात करते हुए पिता ने कहा, "मेरे बेटे ने कभी कानून की पढ़ाई नहीं की, लेकिन उसे हर चीज में दिलचस्पी है। वह जानता है कि कब और कितना बोलना है और कब चुप रहना है। असल में, उसने मुझे सिखाया कि अर्जियों को कैसे स्कैन और अपलोड किया जाता है। कोविड के समय, जब ज्यादातर लोग जूम मीटिंग करना सीख रहे थे, तब अथर्व ऑनलाइन कोर्ट की कार्यवाही देख रहा था।"

अपना केस खुद लड़ने के लिए वह सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर गया। वहां से विशेष अनुमति याचिका (SLP) के फॉर्मेट डाउनलोड किए। पुराने फैसलों को पढ़ा। फिर खुद ही अर्जी तैयार की और उसे ऑनलाइन फाइल कर दिया। उसके पिता बताते हैं कि इसमें मित्रा मैडम और भारती मैडम ने उसकी मदद की।

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