
नई दिल्ली। ‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि ऐसा मंत्र है जो हर भारतीय में स्वदेशी, स्वावलंबन और स्वतंत्रता की भावना जगाता है। ‘वंदे मातरम’ गीत की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर इसी भाव को केंद्र में रखते हुए 77वें गणतंत्र दिवस पर कर्तव्य पथ पर प्रस्तुत गुजरात की झांकी विशेष आकर्षण का केंद्र बनी।
इस झांकी में ‘वंदे मातरम’ शब्द की पृष्ठभूमि से शुरू होकर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण की ऐतिहासिक यात्रा, उसके बदलते स्वरूप और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी घटनाओं को प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया। झांकी ने यह दिखाया कि कैसे ‘वंदे मातरम’ भारत की आज़ादी, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया।
झांकी में गुजरात के नवसारी में जन्मी वीरांगना मैडम भीकाजी कामा की ऐतिहासिक भूमिका को विशेष रूप से दर्शाया गया। उन्होंने अपने क्रांतिकारी साथियों श्यामजी कृष्ण वर्मा और सरदार सिंह राणा के साथ विदेशी धरती पर भारतीय स्वतंत्रता की मशाल जलाई। मैडम कामा द्वारा डिजाइन किए गए उस ध्वज की यशोगाथा दिखाई गई, जिस पर ‘वंदे मातरम’ अंकित था।
झांकी के अगले हिस्से में मैडम भीकाजी कामा को उनके द्वारा डिजाइन किए गए ध्वज के साथ दिखाया गया। उन्होंने यह ध्वज वर्ष 1907 में पेरिस में पहली बार विदेशी धरती पर फहराया था। यह ध्वज बाद में जर्मनी के स्टटगार्ट और बर्लिन में आयोजित ‘इंडियन सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस’ में भी लहराया गया। उनकी अर्ध-प्रतिमा के नीचे संविधान में सूचीबद्ध सभी भारतीय भाषाओं में ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ प्रदर्शित किया गया।
झांकी के मध्य भाग में राष्ट्रीय ध्वज के विकास की क्रमिक यात्रा को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया। इस यात्रा की शुरुआत वर्ष 1906 से दिखाई गई, जब कोलकाता के पारसी बागान में क्रांतिकारियों ने विदेशी वस्तुओं की होली जलाकर स्वदेशी का आह्वान करते हुए ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ ध्वज फहराया। इसके बाद
इन सभी ऐतिहासिक पड़ावों को झांकी में दर्शाया गया।
राष्ट्रीय ध्वज की यात्रा के साथ-साथ झांकी में भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख आंदोलनों की झलक भी प्रस्तुत की गई, जिससे आज़ादी की कीमत और संघर्ष को दर्शाया गया।
झांकी के अंतिम हिस्से में महात्मा गांधी को चरखे के साथ एक विशाल धर्म चक्र के रूप में दिखाया गया। यह भाग स्वदेशी, स्वावलंबन और स्वतंत्रता की भावना को दर्शाता था। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आगे बढ़ाए जा रहे ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान से इस ऐतिहासिक विचारधारा का सुंदर समन्वय किया गया।
‘राष्ट्रीय शायर’ के रूप में प्रसिद्ध झवेरचंद मेघाणी द्वारा रचित गीत ‘कसुंबी नो रंग’ की लय पर कलाकारों ने प्रस्तुति दी। देशभक्ति और बलिदान की भावना से ओत-प्रोत इस संगीत ने झांकी को और अधिक जीवंत बना दिया।
इस झांकी को गुजरात सरकार के सूचना विभाग द्वारा प्रस्तुत किया गया। इसके निर्माण में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा
इस वर्ष गणतंत्र दिवस परेड में 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों और केंद्र सरकार के 13 मंत्रालयों की कुल 30 झांकियां प्रदर्शित की गईं। कर्तव्य पथ पर आयोजित सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में लगभग 2500 कलाकारों ने हिस्सा लिया, जबकि देश-भर से 10,000 विशेष अतिथियों को आमंत्रित किया गया।
परेड की शुरुआत राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर प्रधानमंत्री द्वारा शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इसके बाद राष्ट्रपति सलामी मंच पर पहुंचीं, राष्ट्रगान हुआ और 21 तोपों की सलामी के साथ समारोह औपचारिक रूप से प्रारंभ हुआ।
77वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा उपस्थित रहे।
इस वर्ष पहली बार ‘साइलेंट वॉरियर्स’ के रूप में पहचाने जाने वाले पशुओं ने परेड में हिस्सा लिया। इसमें मंगोलियन प्रजाति के बेक्ट्रियन ऊंट, सियाचिन में कार्यरत खच्चर, शिकारी पक्षी और सैन्य श्वान दस्ते शामिल रहे।
इस वर्ष सीआरपीएफ की पुरुष टुकड़ी का नेतृत्व पहली बार 26 वर्षीय सहायक कमांडेंट सिमरन बाला ने किया। गांधीनगर के सरकारी महिला कॉलेज से स्नातक सिमरन बाला ने इस उपलब्धि से नई मिसाल कायम की।
इस वर्ष पहली बार भारतीय सेना ने ‘बैटल एरे’ फॉर्मेट में परेड की झलक दिखाई। इसके साथ ही यूरोपीय यूनियन की टुकड़ी ने भी परेड में हिस्सा लिया, जिससे समारोह की अंतरराष्ट्रीय गरिमा और बढ़ी।
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