NEET परीक्षा का खूनी सच: 48 घंटे में 5 मौतें, PM मोदी को खुला खत, अभिजीत दिपके ने रख दी ये बड़ी मांग

Published : Jun 19, 2026, 10:53 AM IST
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सार

क्या NEET विवाद और परीक्षा के दबाव ने छात्रों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया? क्या पेपर लीक और सिस्टम की कथित विफलताओं की कीमत युवा अपनी जान देकर चुका रहे हैं? क्या NEET पीड़ित परिवारों को 1 करोड़ रुपये मुआवज़ा देने की मांग पर सरकार करेगी कार्रवाई? क्या प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही के बिना छात्रों का भरोसा वापस आ पाएगा?

Abhijeet Dipke Open Letter To PM Modi: भारत की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा 'नीट' (NEET UG) इस समय सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि छात्रों के लिए एक खौफनाक मानसिक चक्रव्यूह बन चुकी है। पेपर लीक के विवादों, बार-बार होने वाली अनिश्चितताओं और दोबारा परीक्षा (री-टेस्ट) के जानलेवा दबाव ने देश के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। इस गंभीर संकट के बीच, 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक बेहद भावुक और चेतावनी भरा खुला पत्र लिखा है। इस पत्र ने देश के राजनीतिक और शैक्षिक गलियारों में एक नया तूफान खड़ा कर दिया है, जिसमें पीड़ित परिवारों के लिए ₹1 करोड़ के मुआवजे की मांग की गई है।

मौत का खौफनाक आंकड़ा: 11 छात्रों ने तोड़ा दम, सिस्टम बना मूकदर्शक

अभिजीत दिपके ने अपने पत्र में जो खुलासे किए हैं, वे किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कँपाने के लिए काफी हैं। पत्र के मुताबिक, हाल के हफ्तों में नीट परीक्षा के भारी तनाव के कारण देश भर में 11 मासूम छात्र आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर हो चुके हैं। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इन 11 मौतों में से 5 मौतें महज पिछले 48 घंटों के भीतर हुई हैं। जैसे-जैसे दोबारा परीक्षा की तारीख नजदीक आ रही है, युवाओं पर मंडराता डिप्रेशन का साया गहराता जा रहा है। दिपके ने लिखा कि पिछले दो महीनों में उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उन पीड़ित परिवारों से मुलाकात की है, जिनके हंसते-खेलते बच्चे इस भ्रष्ट और नाकाम सिस्टम की वेदी पर चढ़ गए।

आर्थिक बर्बादी का चक्रव्यूह: सपनों के लिए लिया लोन अब बना गले की फांसी

इस त्रासदी का एक और सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जान गंवाने वाले छात्र सिर्फ अपने माता-पिता की आंखों के तारे नहीं थे, बल्कि उनके पूरे परिवार की आर्थिक उम्मीदें भी थे। भारत के मध्यवर्गीय और गरीब परिवारों ने अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने के सपने को पूरा करने के लिए अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई दांव पर लगा दी थी। कई परिवारों ने भारी-भरकम ब्याज दरों पर 'एजुकेशन लोन' लिए थे। अब जब सिस्टम की नाकामी और पेपर लीक के कारण उनके बच्चों के सपने बेरहमी से टूट गए और उन्होंने दम तोड़ दिया, तो ये परिवार भावनात्मक रूप से पूरी तरह तबाह हो चुके हैं। वे अब बैंकों के कर्ज और तबाही के उस मुहाने पर खड़े हैं, जहां से निकलने का उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है।

 

 

शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की गूंज: ₹1 करोड़ का मुआवजा और जवाबदेही तय करने की मांग

इस पत्र के जरिए अभिजीत दिपके ने सीधे केंद्र सरकार पर हमला बोला है और प्रधानमंत्री मोदी से तुरंत इस राष्ट्रीय आपदा में दखल देने की गुहार लगाई है। उन्होंने सरकार के सामने प्रमुख रूप से ये मांगें रखी हैं:

  • ₹1 करोड़ की आर्थिक सहायता: प्रत्येक पीड़ित परिवार को तुरंत ₹1 करोड़ का मुआवजा दिया जाए ताकि वे कर्ज के जाल से मुक्त हो सकें।
  • धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: परीक्षा प्रणाली के कुप्रबंधन और बार-बार होने वाले पेपर लीक विवादों के कारण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से तुरंत इस्तीफे की मांग की गई है।
  • कड़ी जवाबदेही और सुधार: देश की शिक्षा व्यवस्था से जनता और छात्रों का भरोसा पूरी तरह उठ चुका है, इसलिए इस नाकामी के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।

20 जून को जंतर-मंतर पर महा-आंदोलन: परीक्षा से ठीक एक दिन पहले आर-पार की लड़ाई

यह पूरा मामला अब सिर्फ कागजी दांव-पेंच तक सीमित नहीं रहने वाला है। दिपके ने एक बहुत बड़ी घोषणा करते हुए कहा है कि देश भर के पीड़ित छात्र और उनके समर्थक अपनी मांगों को लेकर 20 जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विशाल विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठा होने जा रहे हैं।

आंदोलन का क्या है मुख्य उद्देश्य?

इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य छात्रों के अधिकारों की रक्षा करना और देश की प्रतियोगी परीक्षाओं में खो चुके भरोसे को बहाल करना है। सस्पेंस इस बात को लेकर और ज्यादा गहरा गया है क्योंकि ठीक इसके अगले दिन, यानी 21 जून को नीट यूजी 2026 की दोबारा परीक्षा (Re-test) तय परीक्षा केंद्रों पर आयोजित होने वाली है। अब देखना यह है कि जंतर-मंतर पर भड़कने वाली यह चिंगारी परीक्षा प्रणाली की इस बड़ी आग को शांत कर पाती है या सरकार को कोई बड़ा फैसला लेने पर मजबूर होना पड़ता है।

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