
नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) का नया डिजिटल मूल्यांकन सिस्टम यानी ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) इस समय देश के लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए एक बड़ा मानसिक तनाव बन चुका है। आंसर-शीट के पन्ने गायब होने, अंकों की गंभीर गड़बड़ियों और स्कैनिंग में खामियों को लेकर जहाँ एक तरफ चौतरफा चीख-पुकार मची है, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर अचानक एक बिल्कुल उलट नजारा दिखने लगा है। देश के रसूखदार स्कूलों के प्रिंसिपलों के वीडियो अचानक सामने आने लगे हैं, जो इस सिस्टम को एक "क्रांतिकारी सुधार" बताकर इसकी तारीफों के पुल बांध रहे हैं। इस अजीब विरोधाभास ने अब एक नया और गहरा सस्पेंस पैदा कर दिया है कि आखिर इस संकट के बीच कामयाबी की यह झूठी कहानी कौन और क्यों गढ़ रहा है?
जब 12वीं क्लास के नतीजे आने के बाद छात्र और उनके माता-पिता दोबारा मूल्यांकन (Re-evaluation) के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे, तब इस डिजिटल सिस्टम की ब्रांडिंग करने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई? इस 'नैरेटिव कंट्रोल' के खेल से जुड़े पर्दे के पीछे के कुछ चौंकाने वाले पहलू इस प्रकार हैं:
They introduced OSM without proper planning, students suffered due to evaluation mistakes, and instead of accepting the flaws, the entire machinery went into damage control mode.
First make mistakes, then spend crores on PR, influencers, and friendly media to cover them up.… pic.twitter.com/CzMp9fHODF— Firoz Ahmad (@AhmadFiroz01) May 29, 2026
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा और सनसनीखेज खुलासा मुंबई और ओडिशा के सीनियर प्रिंसिपलों और शिक्षाविदों के बयानों से हुआ है। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, कोविड काल के दौरान जब 9वीं क्लास के लिए इस सिस्टम का ट्रायल किया गया था, तो यह तकनीकी दिक्कतों (Glitches) के कारण बुरी तरह फेल हो गया था और बोर्ड ने इस विचार को ठंडे बस्ते में डाल दिया था।
ओडिशा (भुवनेश्वर) की एक सीनियर प्रिंसिपल ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "12वीं क्लास के लिए OSM को साल 2026 से पहले लागू करने की कोई योजना ही नहीं थी।" बोर्ड ने बिना किसी पर्याप्त तैयारी और शिक्षकों को उचित ट्रेनिंग दिए बिना, इस बेहद संवेदनशील परीक्षा चक्र पर इसे जबरन थोप दिया।
डीएवी (DAV) स्कूल के एक शिक्षक ने नतीजे घोषित होने से पहले ही आगाह किया था कि इस साल का रिजल्ट एक बड़े तकनीकी दलदल में फंसने वाला है। मूल्यांकन के दौरान शिक्षकों को रोजाना इन भयानक अनुभवों से गुजरना पड़ा:
दिल्ली के 12वीं क्लास के पीड़ित छात्र स्वयं मोहंती का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि स्कूलों को कोई 'नैरेटिव टूलकिट' बांटी गई है या नहीं, लेकिन उनके सवाल अनसुने हैं और उनके करियर के नतीजे अब एक राजनीतिक हथियार बन चुके हैं। अभिभावकों का मानना है कि प्रिंसिपलों द्वारा वीडियो बनाकर किया जा रहा यह प्रचार एक घटिया पीआर (PR) हथकंडा है।
करियर, दाखिले और स्कॉलरशिप के इस बेहद नाजुक मोड़ पर, यह लड़ाई अब सिर्फ तकनीकी खामियों की नहीं रह गई है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की सबसे बड़ी परीक्षा संस्था और जनता के बीच पैदा हुए 'भरोसे के अंतर' (Trust Deficit) की बन चुकी है। क्या सीबीएसई अपनी गलतियों को सुधारेगा, या फिर इस डिजिटल प्रोपेगैंडा के पीछे छात्रों का भविष्य ऐसे ही दांव पर लगा रहेगा? ये सवाल अब भी अनुत्तरित है।
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