
युगांडा में इंसानों के बीच चला गृह युद्ध तो काफी पहले थम गया था, लेकिन अब वहां एक और 'सिविल वॉर' की खबर आई है। पर ये लड़ाई इंसानों के बीच नहीं, बल्कि इंसानों के सबसे करीबी रिश्तेदार माने जाने वाले चिंपैंज़ियों के बीच हो रही है। जी हां, आपने सही सुना। युगांडा के जंगली चिंपैंज़ियों का एक बड़ा झुंड अब दो गुटों में बंटकर एक-दूसरे की जान का दुश्मन बन गया है। इस मामले पर रिसर्च कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि जो चिंपैंज़ी कभी एक-दूसरे के दोस्त हुआ करते थे, वे अब लड़-लड़कर मर रहे हैं।
आमतौर पर चिंपैंज़ियों के छोटे झुंडों में लड़ाई होती रहती है, लेकिन वो अक्सर दूसरे झुंडों के साथ होती है। खाना, पानी या रहने की अच्छी जगहों के लिए अलग-अलग झुंडों (पैन ट्रोग्लोडाइट्स) के बीच लड़ाई आम बात है। लेकिन, एक ही झुंड का दो हिस्सों में बंट जाना और फिर आपस में ही लड़ना बेहद दुर्लभ माना जाता है।
प्राइमेटोलॉजिस्ट (प्राइमेट्स यानी बंदरों की प्रजाति का अध्ययन करने वाली वैज्ञानिक) जेन गुडॉल बताती हैं कि करीब 50 साल पहले तंजानिया के गोम्बे में एक चिंपैंज़ी ग्रुप के साथ ऐसा ही कुछ हुआ था। तब भी एक बड़ा झुंड दो छोटे गुटों में बंट गया था। धीरे-धीरे, एक गुट ने दूसरे गुट के सदस्यों पर हमला करके उन्हें मारना शुरू कर दिया। चार साल के अंदर, नए गुट के नर चिंपैंज़ियों ने दूसरे गुट के छह नर और एक मादा को मार डाला था। हालांकि, इस घटना के बारे में वैज्ञानिकों के पास बहुत सीमित जानकारी है, इसलिए वे मानते थे कि ऐसी घटनाएं न के बराबर होती हैं।
युगांडा के किबाले नेशनल पार्क में चिंपैंज़ियों के बीच ये 'गृह युद्ध' कोई आज या कल में शुरू नहीं हुआ। रिसर्चर्स 1998 से यहां के नोगोगो चिंपैंज़ी समुदाय पर स्टडी कर रहे हैं। इस समुदाय में करीब 200 सदस्य थे और वैज्ञानिक लगभग 30 सालों से उन पर नजर रख रहे थे। शुरुआत में ये सभी चिंपैंज़ी एक साथ रहते थे। लेकिन दिन के वक्त वे खाना खोजने के लिए अस्थायी तौर पर छोटे-छोटे ग्रुप्स में बंट जाते थे।
1998 से 2014 के बीच, कुछ छोटे ग्रुप्स ज्यादा समय तक एक साथ टिकने लगे। 2015 तक, यह बड़ा समुदाय स्थायी रूप से दो अलग-अलग गुटों में बंट गया। इसके बाद, वे दो अलग ग्रुप्स की तरह ही रहने और बच्चे पैदा करने लगे। धीरे-धीरे दोनों गुटों का आकार बढ़ने लगा। इस दौरान भी दोनों गुटों के कुछ सदस्यों के बीच दोस्ती बनी हुई थी। लेकिन 2018 आते-आते ये दुर्लभ दोस्ती भी खत्म हो गई। दोनों गुट एक-दूसरे से बहुत दूर हो गए और उनके बीच हमले शुरू हो गए। ये हमले अक्सर जानलेवा होते थे और कई चिंपैंज़ियों की मौत की वजह बने। रिसर्चर्स का कहना है कि यह लड़ाई काफी लंबे समय तक चली।
इस आपसी लड़ाई में कई नर चिंपैंज़ी मारे गए। वहीं, बिना किसी वजह के गायब होने वाले चिंपैंज़ियों की संख्या भी बढ़ गई। साथ ही, बच्चों की हत्याएं (Infanticide) भी बढ़ गईं। इस स्टडी से जुड़े एरॉन सैंडल कहते हैं, "जब हम इंसानों की बात करते हैं तो गृह युद्ध का एक खास मतलब होता है। चिंपैंज़ियों के कोई देश या वैसी व्यवस्था नहीं होती। साथ ही, ये सब एक-दूसरे को जानते थे। इसलिए इसे गृह युद्ध कहने में मुझे थोड़ी हिचकिचाहट होती है।" उन्होंने यह भी बताया कि रिसर्च पेपर में 2024 तक का डेटा शामिल है, लेकिन 2025 और 2026 में भी और हमले और हत्याएं हुई हैं।
रिसर्चर्स का अनुमान है कि ग्रुप की आबादी बढ़ने से खाने-पीने की चीजों को खोजने में दिक्कतें आने लगीं, शायद यही वजह इन छोटे गुटों के बनने और फिर गृह युद्ध तक पहुंचने का कारण बनी। ऑस्टिन की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के एंथ्रोपोलॉजिस्ट (मानव विज्ञानी) एरॉन सैंडल और उनके साथियों ने युगांडा के किबाले नेशनल पार्क के नोगोगो चिंपैंज़ी समुदाय के बीच इस 'गृह युद्ध' पर स्टडी की है। उनकी यह स्टडी हाल ही में 'साइंस' जर्नल में छपी है।
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