
वॉशिंगटन: ईरान के साथ जंग लंबी खिंचती देख राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुश्किलें बढ़ गई हैं। दशकों पुराना एक अमेरिकी कानून उनके लिए सिरदर्द बन गया है। दरअसल, ट्रंप ने इसी कानून का हवाला देकर कांग्रेस (अमेरिकी संसद) की मंजूरी के बिना ईरान पर हमला शुरू किया था। इस कानून के तहत उन्हें 60 दिनों तक सैन्य कार्रवाई करने की छूट थी, लेकिन अब यही 60 दिन की समयसीमा उन पर भारी पड़ रही है।
यह पूरा मामला 1973 के 'वॉर पावर्स रेजोल्यूशन' से जुड़ा है। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को कांग्रेस की मंजूरी के बिना युद्ध छेड़ने से रोकता है। जब डेमोक्रेट्स ने ईरान के साथ तनाव पर सवाल उठाए, तो ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी ने इसी कानून की आड़ ली। डेमोक्रेट्स ने पांच बार ट्रंप को रोकने की कोशिश की, लेकिन सीनेट में रिपब्लिकन सांसदों ने हर बार उन्हें रोक दिया। डेमोक्रेट्स चाहते थे कि ट्रंप सैन्य कार्रवाई रोकने के साथ-साथ कांग्रेस से चर्चा करें।
अब इसी कानून का एक नियम ट्रंप के लिए मुसीबत बन गया है। कानून के मुताबिक, अगर राष्ट्रपति कांग्रेस की मंजूरी के बिना सैन्य कार्रवाई शुरू करते हैं, तो उन्हें 60 दिनों के अंदर इसे खत्म करना होगा। अगर कार्रवाई जारी रखनी है तो कांग्रेस की मंजूरी लेनी होगी। ऐसे में ट्रंप के पास तीन रास्ते बचते हैं: पहला, जंग जारी रखने के लिए कांग्रेस से इजाजत मांगें। दूसरा, युद्ध खत्म कर दें। तीसरा, खुद ही समयसीमा बढ़ा लें।
कानून में एक और व्यवस्था है। अगर राष्ट्रपति लिखित में यह बताते हैं कि सेना को सुरक्षित वापस बुलाने के लिए और समय चाहिए, तो उन्हें 30 दिन की मोहलत और मिल सकती है। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह मोहलत सिर्फ सेना की वापसी के लिए है, न कि एक बड़ी जंग जारी रखने के लिए।
अमेरिका ने ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को हमला शुरू किया था। तब ट्रंप ने कहा था कि वह कमांडर-इन-चीफ के तौर पर मिले अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने इसे मध्य-पूर्व में अमेरिकी ठिकानों और इजरायल जैसे सहयोगी देशों की रक्षा के लिए जरूरी बताया था। हालांकि, कई डेमोक्रेट्स ने इसे गैर-कानूनी बताया। इसके जवाब में व्हाइट हाउस और रिपब्लिकन ने कहा कि राष्ट्रपति वॉर पावर्स एक्ट के 60 दिन के नियम के दायरे में काम कर रहे हैं।
ट्रंप ने 2 मार्च को कांग्रेस को इस सैन्य कार्रवाई की आधिकारिक जानकारी दी थी। इस तारीख से 60 दिन 1 मई को पूरे हो रहे हैं। अगर 1 मई तक युद्ध खत्म नहीं होता, तो ट्रंप को कोई बड़ा फैसला लेना होगा। बता दें कि 2002 में इराक के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को मंजूरी देने के बाद से अमेरिकी कांग्रेस ने किसी भी दूसरे सैन्य अभियान के पक्ष में वोट नहीं किया है।
कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी संकेत दिए हैं कि वे 60 दिन से ज्यादा युद्ध को बढ़ाने का समर्थन नहीं करेंगे। यूटा से रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कर्टिस ने इस महीने की शुरुआत में एक लेख में साफ कहा था कि वह कांग्रेस की मंजूरी के बिना 60 दिन से आगे की सैन्य कार्रवाई का समर्थन नहीं करेंगे। फॉरेन अफेयर्स कमेटी के अध्यक्ष ब्रायन मैस्ट जैसे रिपब्लिकन नेताओं ने भी चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष मई तक खिंचता है तो राष्ट्रपति के लिए समर्थन कम हो जाएगा।
कई जानकारों का मानना है कि ट्रंप इस समयसीमा को नजरअंदाज कर सकते हैं। पहले भी दोनों पार्टियों के राष्ट्रपतियों ने तर्क दिया है कि वॉर पावर्स एक्ट असंवैधानिक है क्योंकि यह कमांडर-इन-चीफ के तौर पर राष्ट्रपति के अधिकारों को सीमित करता है। 2011 में, राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लीबिया में सैन्य हस्तक्षेप को 60 दिन की सीमा के बाद भी जारी रखा था। ओबामा ने दलील दी थी कि वहां कोई जमीनी सेना नहीं है और लगातार लड़ाई नहीं हो रही है। हो सकता है कि ईरान के मामले में ट्रंप भी ऐसी ही कोई दलील दें।
2019 में भी ट्रंप ने यमन युद्ध में सऊदी अरब को दिए जा रहे अमेरिकी सैन्य समर्थन को खत्म करने वाले एक प्रस्ताव को वीटो कर दिया था। तब ट्रंप ने कहा था कि यह उनके संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की एक खतरनाक कोशिश है। हालांकि, इस बार समयसीमा को नजरअंदाज करना रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक संकट पैदा कर सकता है। पार्टी ने अब तक ट्रंप को कांग्रेस की निगरानी के बिना युद्ध करने की काफी आजादी दी है, लेकिन शायद अब ऐसा न हो।
Asianet News Hindi पर पढ़ें देशभर की सबसे ताज़ा National News in Hindi, जो हम खास तौर पर आपके लिए चुनकर लाते हैं। दुनिया की हलचल, अंतरराष्ट्रीय घटनाएं और बड़े अपडेट — सब कुछ साफ, संक्षिप्त और भरोसेमंद रूप में पाएं हमारी World News in Hindi कवरेज में। अपने राज्य से जुड़ी खबरें, प्रशासनिक फैसले और स्थानीय बदलाव जानने के लिए देखें State News in Hindi, बिल्कुल आपके आसपास की भाषा में। उत्तर प्रदेश से राजनीति से लेकर जिलों के जमीनी मुद्दों तक — हर ज़रूरी जानकारी मिलती है यहां, हमारे UP News सेक्शन में। और Bihar News में पाएं बिहार की असली आवाज — गांव-कस्बों से लेकर पटना तक की ताज़ा रिपोर्ट, कहानी और अपडेट के साथ, सिर्फ Asianet News Hindi पर।