
Mount Everest Climber Death: पर्वतों के राजा और दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट से एक ऐसी खबर आई है जिसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। हैदराबाद के 53 वर्षीय जांबाज पर्वतारोही अरुण कुमार तिवारी ने आखिरकार एवरेस्ट फतह तो कर लिया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। चोटी से नीचे उतरते समय अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्होंने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। अब उनके परिवार ने एक ऐसा दिल दहला देने वाला और रहस्यमयी फैसला लिया है, जिसकी चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। परिवार ने उनके पार्थिव शरीर को एवरेस्ट के 'डेथ ज़ोन' में ही छोड़ने का निर्णय लिया है।
अरुण कुमार तिवारी कोई नौसिखिए नहीं थे। वे हैदराबाद की एक बड़ी आईटी कंपनी में सीनियर डायरेक्टर के पद पर तैनात थे और पहाड़ों को चूमना उनका जुनून था। इससे पहले वे रूस के माउंट एल्ब्रस, अमेरिका के माउंट डेनाली और अर्जेंटीना के माउंट एकॉनकागुआ जैसी जानलेवा चोटियों को फतह कर चुके थे। साल 2025 में उन्होंने पहली बार एवरेस्ट की तरफ कदम बढ़ाए थे, लेकिन तब 7,200 मीटर की ऊंचाई से उन्हें बैरंग लौटना पड़ा था। हार न मानते हुए 2026 के इस सीज़न में वे दोबारा मौत को चुनौती देने निकले। इस बार वे चोटी पर पहुंचने में सफल तो रहे, लेकिन यह ऐतिहासिक कामयाबी एक अंतहीन सस्पेंस और मातम में बदल गई।
यह हादसा एवरेस्ट के सबसे खतरनाक और डरावने हिस्से 'हिलेरी स्टेप' के पास हुआ। यह करीब 40 फीट ऊंची, लगभग बिल्कुल सीधी चट्टान है जो सीधे 'डेथ ज़ोन' (मौत के इलाके) में आती है। यहां ऑक्सीजन का स्तर इतना कम होता है कि इंसानी दिमाग और शरीर काम करना बंद कर देते हैं। इस सीज़न में एक ही दिन में रिकॉर्ड 274 पर्वतारोहियों ने चोटी पर चढ़ाई की, जिससे हिलेरी स्टेप पर भारी जाम लग गया। जब थकान से चूर अरुण कुमार नीचे उतर रहे थे, तो इसी खतरनाक मोड़ पर काल ने उन्हें घेर लिया। नेपाल की 'पायनियर एडवेंचर्स' कंपनी के डायरेक्टर निवेश कार्की के मुताबिक, उस वक्त उनकी मदद के लिए चार शेरपा मौजूद थे, लेकिन कुदरत के इस क्रूर खेल के आगे वे भी बेबस हो गए।
माउंट एवरेस्ट से किसी शव को नीचे लाना दुनिया के सबसे जटिल और रोंगटे खड़े कर देने वाले ऑपरेशनों में से एक है। हिलेरी स्टेप जैसी सीधी खड़ी ढलान से एक बेजान शरीर को उतारने के लिए कम से कम 8 से 12 बेहद कुशल शेरपाओं की फौज की जरूरत होती है। इसके लिए भारी मात्रा में बोतलबंद ऑक्सीजन और विशेष उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है, जिसमें लाखों रुपये का खर्च आता है। इसके बावजूद इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि शव सुरक्षित नीचे आ पाएगा। कड़कड़ाती ठंड और बर्फीले तूफानों के बीच शव इतनी तेजी से भारी और क्षतिग्रस्त होने लगते हैं कि रेस्क्यू करने वालों की जान भी दांव पर लग जाती है।
इस पूरे घटनाक्रम पर बुधवार, 27 मई को अरुण कुमार के जीजा सुधीर उपाध्याय ने उस दर्दनाक सच से पर्दा उठाया जिसने उन्हें यह फैसला लेने पर मजबूर किया। उन्होंने कहा, "वह (तिवारी) अब भगवान शिव के धाम में हैं। शव को वापस लाने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि जब तक वह हम तक पहुंचता, तब तक वह बहुत बुरी तरह क्षतिग्रस्त और क्षत-विक्षत हो चुका होता। वहां (एवरेस्ट पर) इस तरह के रेस्क्यू अभियान कभी सफल नहीं माने जाते।" आस्था और तकनीकी लाचारी के बीच झूलते परिवार ने आखिरकार भारी मन से अपने लाडले को पहाड़ों की गोद में ही छोड़ना बेहतर समझा।
पहाड़ों पर शवों को वहीं छोड़ देना कोई नई बात नहीं है; एवरेस्ट पर आज भी सैकड़ों पर्वतारोहियों के शव 'लैंडमार्क' की तरह पड़े हुए हैं। अरुण कुमार अकेले ऐसे बदनसीब नहीं थे। अमेरिका में रहने वाले 46 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल संदीप अरे-जो मूल रूप से आंध्र प्रदेश के हिंदुपुर के रहने वाले थे-की भी इसी दौरान एवरेस्ट फतह करने के बाद मौत हो गई। हालांकि, संदीप का शव नीचे लाया जा सका और बुधवार, 27 मई को बेंगलुरु में उनका अंतिम संस्कार किया गया। दो आईटी दिग्गजों की इस मौत ने एवरेस्ट की इस चमकती हुई खूबसूरती के पीछे छिपे उस खौफनाक सस्पेंस को दोबारा उजागर कर दिया है, जहां जिंदगी और मौत के बीच महज चंद सांसों का फासला होता है।
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