Ghaziabad Sisters Suicide: दिमाग पर कैसे हावी हो रहे टास्क बेस्ड गेम, एक्सपर्ट से जानें काम की चीज

Published : Feb 06, 2026, 08:00 PM IST
Ghaziabad triple sister suicide case

सार

गाजियाबाद में 12, 14 और 16 साल की तीन बहनों की मौत को डिजिटल लत और ऑनलाइन दुनिया में अत्यधिक डूबे रहने से जोड़ा जा रहा है। न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. राहुल चावला ने बच्चों में अनकंट्रोल्ड स्क्रीन टाइम और गेमिंग के गंभीर मानसिक जोखिमों पर चेतावनी दी है।

Ghaziabad Triple Suicide Case: बीते बुधवार को गाजियाबाद में एक रिहायशी इमारत की नौवीं मंजिल से तीन सगी बहनों ने छलांग लगा दी, जिससे उनकी मौत हो गई। कोई इसे सुसाइड बता रहा है, तो कोई इसमें सस्पेंस का एंगल भी ढूंढ रहा है। हालांकि, पूरे मामले की जांच चल रही है, लेकिन आज के समय में बच्चों और किशोरों से जुड़े मामलों में जो सबसे ज्यादा चिंता की बात है, वो दिमाग पर हावी हो रहे ऑनलाइन टास्क बेस्ड गेम्स हैं।

डिजिटल लत के प्रति ज्यादा संवेदनशील क्यों होते हैं टीनेजर?

बच्चों और किशोरों में बढ़ती डिजिटल निर्भरता को लेकर AIIMS नई दिल्ली में प्रशिक्षित न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. राहुल चावला ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने 4 फरवरी को इंस्टाग्राम पर एक वीडियो के जरिए माता-पिता को चेतावनी दी कि बिना रोक-टोक स्क्रीन टाइम बच्चों की मेंटल हेल्थ के लिए खतरनाक हो सकता है। डॉ. चावला के अनुसार, किशोर खासतौर पर एडिक्टिव डिजिटल गेम्स के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उनका दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता। इस उम्र में बच्चों को जोखिम समझने और लंबे समय के नतीजों का अंदाजा लगाने में मुश्किल होती है।

एक खास पैटर्न पर डिजाइन होते हैं टास्क बेस्ड गेम्स

डॉक्टर चावला के मुताबिक, टास्क-बेस्ड गेम्स इस तरह बनाए जाते हैं कि खिलाड़ी बिना सवाल किए निर्देशों का पालन करता रहे, भले ही वे खतरनाक क्यों न हों। इन गेम्स की बनावट ही ऐसी होती है कि किशोरों की सोचने-समझने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाती है।

टास्क-बेस्ड गेम्स दिमाग पर कैसे हावी हो जाते हैं?

ब्लू व्हेल चैलेंज जैसी पुरानी घटनाओं का जिक्र करते हुए डॉ. चावला बताते हैं कि आज के कई नए और ज़्यादा इमर्सिव ऑनलाइन गेम्स में भी ऐसे ही बिहैवियर पैटर्न दिख रहे हैं। ये प्लेटफॉर्म लेवल, पॉइंट्स और मिशन के जरिए गोपनीयता, भावनात्मक जुड़ाव और लगातार मिल रही सक्सेस को इनाम की तरह पेश करते हैं। इससे धीरे-धीरे डेवलप हो रहा एक दिमाग इनके प्रभाव में आ सकता है।

 

किशोरावस्था में दिमाग क्यों होता है ज्यादा जोखिम में?

डॉ. चावला के मुताबिक, किशोरावस्था में दिमाग का वह हिस्सा, जो फैसले लेने और भावनाओं को कंट्रोल करता है, अभी पूरी तरह मैच्योर नहीं होता। वहीं, इमोशनल और रिवॉर्ड सेंटर पहले से ही काफी एक्टिव रहते हैं। ऐसे में जब कोई गेम लगातार तारीफ, वैलिडेशन और मुश्किल चैलेंज देता है, तो दिमाग उसे सिर्फ खेल नहीं बल्कि जरूरी चीज मानने लगता है। कई बार यह डिजिटल दुनिया रियल लाइफ से भी ज्यादा रियलिस्टिक लगने लगती है, जबकि हकीकत में ऐसा होता नहीं है।

गेमिंग कब इमोशनल डिपेंडेंसी बन जाती है?

समय के साथ, डोपामाइन पर आधारित रिवॉर्ड सिस्टम मेंटल डिपेंडेंसी पैदा कर सकता है। इससे दबाव, असफलता का डर और लगातार जुड़े रहने की मजबूरी बन जाती है। डॉ. चावला बताते हैं कि जो किशोर पहले से पढ़ाई के दबाव, अकेलेपन, कम आत्मविश्वास या भावनात्मक परेशानी से जूझ रहे होते हैं, उनके लिए गेम धीरे-धीरे पहचान और सुकून का मुख्य जरिया बन सकता है। इस तरह के मामलों से जुड़े सुसाइड ज्यादातर अचानक नहीं होते, बल्कि यह लंबे समय तक चले भावनात्मक दबाव और थकावट का नतीजा होते हैं।

ज्यादा गेमिंग और मेंटल हेल्थ का कनेक्शन

डॉ. चावला के मुताबिक, रिसर्च में बार-बार यह देखा गया है कि बहुत ज्यादा गेमिंग को चिंता, डिप्रेशन, गुस्से, खुद को नुकसान पहुंचाने और आत्महत्या के व्यवहार से जोड़ा गया है। ब्लू व्हेल जैसे चैलेंज-बेस्ड गेम्स से लेकर PUBG जैसे इमर्सिव प्लेटफॉर्म तक, ऐसे कई उदाहरण सामने आ चुके हैं।

माता-पिता को किन चेतावनी संकेतों पर ध्यान देना चाहिए?

डॉ. चावला का कहना है कि माता-पिता अक्सर सिर्फ स्क्रीन टाइम कम करने पर ध्यान देते हैं, जबकि असली खतरे के संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं। वे चेतावनी देते हैं कि सामाजिक दूरी बनाना, मूड में तेज बदलाव, नींद की समस्या, पढ़ाई में गिरावट, भावनात्मक दूरी और किसी एक गेम या ऑनलाइन दुनिया से अत्यधिक लगाव जैसे संकेतों को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।

समाधान: बातचीत और मानसिक स्वास्थ्य पर जोर

माता-पिता, शिक्षकों और बाल मनोवैज्ञानिकों से इस मुद्दे को गंभीरता से लेने की अपील करते हुए डॉ. चावला कहते हैं कि बच्चों से खुलकर बातचीत बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि सिर्फ स्क्रीन टाइम पर चर्चा करने के बजाय बच्चों को मेंटल हेल्थ, इमोशनल सिक्योरिटी और जरूरत पड़ने पर मदद मांगने के बारे में भी सिखाया जाना चाहिए।

 

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