
India coal Gasification Plan 2026: भारत में कोयले का नाम आते ही अक्सर दिमाग में बिजलीघर, धुआं और प्रदूषण की तस्वीर उभरती है। लेकिन अब सरकार कोयले को सिर्फ बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रखना चाहती। केंद्र सरकार एक ऐसी योजना पर काम कर रही है, जो आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा व्यवस्था, पेट्रोल-डीजल की लागत और औद्योगिक ढांचे को पूरी तरह बदल सकती है।
सरकार का फोकस अब “कोल गैसीफिकेशन” पर है। यानी कोयले को गैस और दूसरे ईंधन उत्पादों में बदलने की तकनीक। केंद्र सरकार का दावा है कि इससे भारत की विदेशों पर निर्भरता घटेगी, उद्योगों को सस्ता कच्चा माल मिलेगा और लंबे समय में पेट्रोलियम उत्पादों की लागत पर भी असर पड़ सकता है।
कोयला एवं खनन मंत्री जी किशन रेड्डी ने नई दिल्ली में आयोजित एक रोड शो के दौरान इसे भारत के कोयला सेक्टर की “नई क्रांति” बताया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में कोल गैसीफिकेशन देश को ऊर्जा सुरक्षा देने के साथ-साथ औद्योगिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा।
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कोल गैसीफिकेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोयले को सीधे जलाने के बजाय उसे रासायनिक तरीके से गैस में बदला जाता है। इस गैस का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में किया जा सकता है। इस तकनीक से तैयार गैस का उपयोग उर्वरक, केमिकल, पेट्रोकेमिकल, स्टील, हाइड्रोजन और ट्रांसपोर्ट फ्यूल बनाने में किया जा सकता है। आसान भाषा में समझें तो भविष्य में यही तकनीक पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधनों के विकल्प तैयार करने में मदद कर सकती है।
केंद्र ने कोयले से गैस बनाने की परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए 37,500 करोड़ रु. की योजना मंजूर की है. उद्देश्य है स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना और आयात पर निर्भरता कम करना.
पश्चिम एशिया की स्थिति ने यह साफ कर दिया है कि भारत किन‑किन चीजों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है. कच्चे… pic.twitter.com/ws2eDjzXrY— SansadTV (@sansad_tv) May 19, 2026
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार की इस योजना से पेट्रोल और डीजल सस्ते होंगे? विशेषज्ञों के मुताबिक इसका सीधा असर तुरंत देखने को नहीं मिलेगा, लेकिन लंबे समय में यह योजना भारत के फ्यूल सेक्टर की तस्वीर बदल सकती है। फिलहाल भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल और कई औद्योगिक उत्पादों के लिए विदेशों पर निर्भर है।
सरकार का कहना है कि भारत हर साल करीब 3 लाख करोड़ रुपये उन उत्पादों के आयात पर खर्च करता है, जो कोल गैसीफिकेशन से देश में ही बनाए जा सकते हैं। अगर देश में बड़े स्तर पर गैसीफिकेशन प्लांट शुरू होते हैं, तो ट्रांसपोर्ट फ्यूल और इंडस्ट्रियल फ्यूल की लागत कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि पेट्रोल की कीमत सिर्फ उत्पादन लागत से तय नहीं होती। इसमें टैक्स, अंतरराष्ट्रीय बाजार, कच्चे तेल की कीमत और सरकारी नीतियां भी अहम भूमिका निभाती हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि पेट्रोल तुरंत सस्ता हो जाएगा, लेकिन सरकार इसे भविष्य की ऊर्जा रणनीति के रूप में देख रही है।
जी किशन रेड्डी ने माना कि कोयला उत्पादन में मजबूत होने के बावजूद भारत कोल गैसीफिकेशन तकनीक में चीन, ऑस्ट्रेलिया और कई अफ्रीकी देशों से पीछे है। दरअसल चीन ने पिछले कई वर्षों में कोयले से गैस और केमिकल बनाने की तकनीक पर भारी निवेश किया है। अब भारत भी इसी दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। सरकार विदेशी तकनीक लाने वाली कंपनियों को प्रोत्साहन देने की तैयारी में है और भरोसा दिलाया गया है कि नीतिगत स्तर पर कोई बाधा नहीं आने दी जाएगी।
केंद्र सरकार ने कोल गैसीफिकेशन परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए करीब 46 हजार करोड़ रुपये के प्रोत्साहन पैकेज को मंजूरी दी है। सरकार चाहती है कि निजी कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां मिलकर इस सेक्टर में तेजी से निवेश करें। ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्यों ने इस दिशा में शुरुआती एक्शन प्लान भी पेश किए हैं। कई अन्य राज्यों के साथ बातचीत चल रही है ताकि वहां भी उद्योगों को नीति और टैक्स में राहत देकर निवेश आकर्षित किया जा सके।
सरकार के मुताबिक भारत के पास 450 बिलियन टन से ज्यादा कोयला भंडार मौजूद है, जो अगले 60 से 70 वर्षों की जरूरतों के लिए पर्याप्त माना जा रहा है।
जी किशन रेड्डी ने कहा कि देश को अपने प्राकृतिक संसाधनों का पूरा इस्तेमाल करना चाहिए ताकि उद्योगों को बढ़ावा मिले, रोजगार पैदा हो और आयात पर निर्भरता कम हो।
कोयले के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार सवाल उठाते रहे हैं। हालांकि सरकार का तर्क है कि पारंपरिक तरीके से कोयला जलाने के मुकाबले गैसीफिकेशन तकनीक ज्यादा आधुनिक और अपेक्षाकृत कम प्रदूषणकारी हो सकती है। फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन के बीच सही तालमेल बनाना होगा। आने वाले समय में यही तय करेगा कि कोल गैसीफिकेशन देश के लिए कितनी बड़ी सफलता साबित होता है।
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