
India Defense Indigenization: भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की कहानी अब सिर्फ तेजस, टैंक या युद्धपोत जैसे बड़े हथियार प्लेटफॉर्म बनाने तक सीमित नहीं है। नई रणनीति उन हजारों छोटे लेकिन बेहद जरूरी पुर्जों और सब-सिस्टम्स पर केंद्रित है, जिनके बिना ये अत्याधुनिक हथियार लंबे समय तक ऑपरेशनल नहीं रह सकते। रक्षा मंत्रालय की Positive Indigenisation List (PIL) इसी दिशा में अहम कदम है। (Press Information Bureau)
किसी फाइटर जेट, टैंक या हेलीकॉप्टर की ताकत केवल उसके मुख्य प्लेटफॉर्म से तय नहीं होती। उसके संचालन के लिए हजारों कंपोनेंट्स, स्पेयर पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और सब-सिस्टम्स की लगातार जरूरत होती है। मान लीजिए किसी विमान का एक महत्वपूर्ण रिप्लेसमेंट पार्ट विदेश से आना है और उसकी सप्लाई रुक जाती है। पूरा विमान उपलब्ध होने के बावजूद वह उड़ान भरने में सक्षम नहीं रह सकता। यही चुनौती टैंक, हेलीकॉप्टर और युद्धपोतों के साथ भी लागू होती है। यही कारण है कि भारत अब सप्लाई चेन के उस हिस्से पर पकड़ मजबूत करना चाहता है, जो आमतौर पर सुर्खियों से दूर रहता है।
नई पहल में 405 रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण आइटम्स को स्वदेशी बनाने पर जोर है। इनमें Line Replacement Units (LRUs), सब-सिस्टम, असेंबली, सब-असेंबली, स्पेयर पार्ट्स, कंपोनेंट्स और रॉ मटीरियल जैसी श्रेणियां शामिल हैं। इनका अनुमानित बिजनेस पोटेंशियल करीब ₹3,070 करोड़ बताया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि ₹3,070 करोड़ में पूरे तेजस, Su-30MKI या T-90 को स्वदेशी बनाया जाएगा। यह आंकड़ा इन 405 आइटम्स से बनने वाले संभावित कारोबारी अवसर से जुड़ा है।
तेजस भारत में विकसित और निर्मित लड़ाकू विमान है, लेकिन इसके हर हिस्से को देश में बनाने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। उदाहरण के लिए, तेजस Mk1A में GE F404 इंजन का इस्तेमाल होता है। यानी किसी प्लेटफॉर्म को ‘स्वदेशी’ कहने का अर्थ यह नहीं कि उसके प्रत्येक पार्ट, तकनीक या कच्चे माल का स्रोत भारत ही हो। लक्ष्य समय के साथ घरेलू डिजाइन, निर्माण और सप्लाई क्षमता को बढ़ाना है।
Su-30MKI और T-90 जैसे प्लेटफॉर्म भारत के सैन्य बेड़े का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके लंबे समय तक संचालन के लिए लगातार स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस सपोर्ट चाहिए। ऐसे में विदेशी सप्लाई पर निर्भरता कम करना केवल आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि स्ट्रेटेजिक और ऑपरेशनल जरूरत भी है।
स्वदेशीकरण की अगली कड़ी यह है कि इन पुर्जों को बनाएगा कौन? इसके लिए सरकार का SRIJAN पोर्टल अहम भूमिका निभा रहा है। यह प्लेटफॉर्म रक्षा क्षेत्र में आयातित आइटम्स की पहचान कर भारतीय कंपनियों, MSMEs और स्टार्टअप्स को उनके घरेलू विकास से जोड़ता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मई 2026 तक पांच PILs के तहत 5,012 DPSU आइटम सूचीबद्ध किए जा चुके थे और पिछले पांच वर्षों में 15,700 से अधिक रक्षा आइटम स्वदेशी बनाए गए हैं।
युद्ध में सिर्फ मिसाइल, गोला-बारूद और बड़े हथियार ही महत्वपूर्ण नहीं होते। किसी सिस्टम को लगातार मैदान में सक्रिय रखने के लिए स्पेयर पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, मैकेनिकल कंपोनेंट्स और रिप्लेसमेंट असेंबली की भी जरूरत होती है। यही वजह है कि भारत की नई रणनीति का असली लक्ष्य सिर्फ ‘नया हथियार बनाना’ नहीं, बल्कि मौजूदा हथियारों को लंबे समय तक बिना विदेशी सप्लाई पर अत्यधिक निर्भर हुए ऑपरेशनल बनाए रखना है। यानी तेजस, Su-30MKI और T-90 के पीछे छिपे छोटे पुर्जों पर पकड़ मजबूत करना भारत की बड़ी रक्षा आत्मनिर्भरता की नींव बन सकता है।
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