
Monsoon And Inflation India: केवल में मानसून की दस्तक हो चुकी है, भारत में मानसून केवल आसमान से बरसता पानी नहीं है; यह हमारे खेतों की प्यास बुझाता है, शेयर बाजार की चाल तय करता है और देश के बजट को दिशा देता है। एक अच्छी बारिश देश में खुशहाली लाती है, जबकि कम बारिश नीतियों और आम आदमी की रसोई दोनों का बजट बिगाड़ देती है। इस साल 2026 का मानसून एक बार फिर हमारी अर्थव्यवस्था के लिए कड़ी परीक्षा लेकर आया है। पूर्व वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने बिल्कुल सही कहा था कि मानसून ही भारत का असली वित्त मंत्री है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए जो पूर्वानुमान जारी किए हैं, वे चिंताजनक हैं। मौसम विभाग के अनुसार, इस साल मानसून लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान है, और बारिश में कमी होने की 60 प्रतिशत तक संभावना है। 4 जून को मानसून ने केरल तट पर दस्तक दे दी है, लेकिन प्रशांत महासागर में तेजी से विकसित हो रहे एक बेहद मजबूत 'अल नीनो' (El Niño) का साया इसके ऊपर मंडरा रहा है। यह स्थिति पिछले एक दशक के सबसे कमजोर मानसून का संकेत दे रही है।
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आसमान में कम बारिश के संकट के साथ-साथ, समुद्री रास्तों से भी भारतीय कृषि के लिए बुरी खबर है। पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में शिपिंग बाधित होने से भारत की उर्वरक (fertilizer) आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया और डीएपी (DAP) की कीमतें युद्ध से पहले के स्तर से कहीं अधिक बढ़ गई हैं, जिससे इस साल सरकार का उर्वरक सब्सिडी बिल बढ़कर 2.75 से 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। मानसून की अनिश्चितता और अल नीनो के खतरे को भांपते हुए, सरकार ने 2026 के खरीफ सीजन के लिए उर्वरकों की अपनी मांग का अनुमान भी घटाकर 38.39 मिलियन टन कर दिया है।
जब खेत सूखते हैं, तो उसका सीधा असर आपकी थाली पर पड़ता है। आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank) और इक्रा (ICRA) की रिपोर्ट्स के अनुसार, कमजोर मानसून के कारण कृषि उत्पादन गिर सकता है, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ने का गंभीर खतरा है। अनुमान है कि कम बारिश उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित खुदरा महंगाई दर में वित्त वर्ष 2027 के दौरान 0.4 प्रतिशत तक का उछाल ला सकती है, जिससे महंगाई दर 4.5 प्रतिशत के पार जा सकती है। विशेष रूप से असिंचित (rain-fed) फसलें जैसे दालें, तिलहन, मसाले और मोटे अनाज इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे क्योंकि इनकी सिंचाई मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर है।
पानी की कमी केवल खेतों तक सीमित नहीं है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, देश के 13 प्रमुख जलाशयों में जल स्तर उनकी सामान्य क्षमता के 50 प्रतिशत से भी नीचे चला गया है। दक्षिण और पूर्वी भारत के बेसिन में पानी की तेजी से कमी आ रही है। यह स्थिति आने वाले समय में पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और जलविद्युत (hydropower) उत्पादन के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर सकती है।
जब किसान की आय घटती है, तो पूरे ग्रामीण भारत की क्रय शक्ति (खपत) कम हो जाती है। एफएमसीजी (FMCG) और ऑटोमोबाइल कंपनियां ग्रामीण मांग में मंदी की आशंका को लेकर सतर्क हो गई हैं। एक अनुमान के मुताबिक, सामान्य बारिश से 1 प्रतिशत की गिरावट ग्रामीण खपत की वृद्धि दर को 0.5 से 0.7 प्रतिशत तक गिरा सकती है। ट्रैक्टरों की बिक्री ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक बड़ा सूचक मानी जाती है, और इक्रा (ICRA) का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में ट्रैक्टर बिक्री की वृद्धि दर तेजी से गिरकर मात्र 1 से 4 प्रतिशत रह जाएगी, जो पिछले साल लगभग 19 प्रतिशत थी।
स्थिति चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन हमारे पास इससे निपटने के साधन मौजूद हैं। भारत के पास आज पहले से कहीं बेहतर वैज्ञानिक ज्ञान, जलवायु पूर्वानुमान प्रणाली और मजबूत बफर स्टॉक हैं। अल नीनो का मतलब हमेशा पूर्ण सूखा नहीं होता। जरूरत इस बात की है कि सरकार, कंपनियां और किसान इस अनिश्चितता से निपटने के लिए योजना बनाएं, न कि घबराएं। ग्रामीण स्तर पर नीतियों का सही क्रियान्वयन और जल संरक्षण ही इस आर्थिक और प्राकृतिक चुनौती से हमें पार लगा सकता है।
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