
भोपाल: भारतीय इंजीनियरों और मजदूरों ने प्रकृति की चुनौतियों और भौगोलिक बाधाओं को पार करते हुए एक ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया है। मध्य प्रदेश के स्लीमनाबाद में विंध्य पर्वत श्रृंखला को काटकर बनाई जा रही देश की सबसे लंबी सिंचाई सुरंग (Sleemanabad Tunnel) का काम आखिरकार पूरा हो गया है। मंगलवार दोपहर ठीक 3:30 बजे, मशीनों ने सुरंग की आखिरी चट्टानी दीवार को सफलतापूर्वक तोड़ दिया और दोनों तरफ से आ रही सुरंगें आपस में मिल गईं।
स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, मैकल पहाड़ियों की बेटी 'नर्मदा' और 'सोनभद्र' नदी का विवाह होना था। लेकिन एक गलतफहमी के कारण नर्मदा नाराज होकर पश्चिम की ओर बहते हुए अरब सागर में मिल गईं, जबकि सोनभद्र पूर्व की ओर बहकर गंगा नदी में समा गए। इन दोनों के बीच विंध्य पर्वत एक विशाल दीवार की तरह खड़ा था। प्राकृतिक रूप से विपरीत दिशाओं में बहने वाली इन नदियों के बेसिन को मिलाने के लिए अब आधुनिक इंजीनियरिंग ने इस सुरंग के जरिए एक नया रास्ता बना दिया है।
नर्मदा और सोन घाटियों को अलग करने वाला विंध्य पर्वत आसपास की जमीन से करीब 40 मीटर ऊंचा है। इस पहाड़ के ऊपर एक खुली नहर (Open-Cut Canal) बनाना लगभग नामुमकिन था। इसके लिए 40 मिलियन क्यूबिक मीटर से भी ज्यादा खुदाई करनी पड़ती। इतना ही नहीं, सैकड़ों मीटर चौड़े इलाके को काटना और वहां मौजूद भारी भूजल स्तर से निपटना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। इसलिए इंजीनियरों ने पहाड़ के अंदर से ही सुरंग खोदने का मुश्किल फैसला लिया।
यह विशाल सुरंग कुल 11.95 किलोमीटर (लगभग 12 किमी) लंबी और 10.14 मीटर चौड़ी है। पहाड़ के अंदर की चट्टानें हर 10 से 15 मीटर पर अपना रूप बदल रही थीं। कहीं सख्त संगमरमर और चूना पत्थर थे, तो कहीं अचानक नरम मिट्टी और स्लेट की परतें आ जाती थीं। चूना पत्थर के घुलने से जमीन के नीचे बड़े-बड़े गड्ढे (Sinkholes) बन गए थे। सुरंग के अंदर हर मिनट 18,000 से 25,000 लीटर भूजल घुस रहा था, जिसे मजदूरों को लगातार पंप से बाहर निकालना पड़ता था। इन गंभीर तकनीकी चुनौतियों के कारण अमेरिका की मशहूर 'रॉबिन्स' टनल बोरिंग मशीनें भी यहां फंसकर खराब हो गई थीं। शुरुआत में इस प्रोजेक्ट का बजट सिर्फ ₹799 करोड़ था, जो 17 साल की देरी के बाद बढ़कर ₹1,600 करोड़ तक पहुंच गया।
प्रोजेक्ट में हो रही देरी को देखते हुए इंजीनियरों ने पहाड़ के दोनों सिरों से सुरंग खोदने का फैसला किया। एक तरफ से अमेरिकी रॉबिन्स मशीन और दूसरी तरफ से जर्मन एच.के. (German HK) मशीनों का इस्तेमाल कर पहाड़ को काटा गया। आखिरकार 17 साल की लगातार मेहनत के बाद, मंगलवार दोपहर को 6.5 किलोमीटर लंबी ऊपरी सुरंग और 5.4 किलोमीटर लंबी निचली सुरंग स्लीमनाबाद जंक्शन पर एक-दूसरे से सटीक रूप से मिल गईं। जैसे ही आखिरी चट्टान गिरी, 17 सालों से अंधेरे में काम कर रहे मजदूरों के चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गई।
इस सुरंग की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके जरिए बहने वाला नर्मदा नदी का पानी बिना किसी पंप की मदद के, सिर्फ प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण (Natural Gravity Flow) से ही सोन बेसिन तक पहुंचेगा। यह 'बार्गी डायवर्जन प्रोजेक्ट' मध्य प्रदेश के जबलपुर, कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना जिलों के 1,450 से ज्यादा सूखाग्रस्त गांवों को पीने का पानी और सिंचाई की सुविधा देगा। इसके जरिए कुल 2,45,000 हेक्टेयर जमीन को सींचने का लक्ष्य है, जिसमें से अकेले स्लीमनाबाद सुरंग से जुड़ी जमीन ही 185,000 हेक्टेयर है।
हालांकि सुरंग अब पूरी तरह से तैयार है, लेकिन पानी को आखिरी किसान के खेत तक पहुंचने में अभी कुछ और नहरों और आठ एक्वाडक्ट्स (Aqueducts) का निर्माण बाकी है। मार्च 2026 तक 44,160 हेक्टेयर, सितंबर 2026 तक 87,433 हेक्टेयर और दिसंबर 2027 तक 154,693 हेक्टेयर जमीन को सिंचित करने का लक्ष्य रखा गया है। यह प्रोजेक्ट पूरा होने पर इस क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खेती और लोगों के जीवन स्तर में एक बड़ा बदलाव आएगा।
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