
सिंधु जल समझौते को लेकर भारत के सख्त रुख ने पाकिस्तान की चिंता कई गुना बढ़ा दी है। पिछले एक सप्ताह में पाकिस्तान के कई वरिष्ठ नेताओं और अधिकारियों ने लगातार भारत से बातचीत बहाल करने और जल प्रवाह को लेकर सहयोग की अपील की है। यहां तक कि पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने इस मुद्दे की तुलना होर्मुज स्ट्रेट जैसे अंतरराष्ट्रीय संकट से कर दी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर भारत के किस कदम ने पाकिस्तान की बेचैनी इतनी बढ़ा दी है?
मई 2025 में भारत ने सिंधु जल समझौते को निलंबित करने के बाद सिंधु, चिनाब और झेलम नदियों के जलस्तर, प्रवाह और संचालन संबंधी डेटा पाकिस्तान को देना बंद कर दिया। पाकिस्तान के इंडस वाटर कमिश्नर सैयद मेहर अली शाह के अनुसार, पिछले एक वर्ष में चार बार पत्र भेजे गए, लेकिन भारत की ओर से कोई जवाब नहीं मिला। डेटा नहीं मिलने से पाकिस्तान यह तय नहीं कर पा रहा कि नदी में पानी का उतार-चढ़ाव प्राकृतिक कारणों से है या भारत की किसी रणनीति का हिस्सा।
पाकिस्तान का आरोप है कि भारत जरूरत के समय पानी रोकता है और बाद में अचानक छोड़ देता है, जिससे खेती और बाढ़ दोनों का खतरा बढ़ जाता है। पाकिस्तानी अधिकारियों का दावा है कि मराला बैराज के निचले आउटलेट फिर से सक्रिय किए गए हैं, जिससे भारत पानी के प्रवाह को अपनी जरूरत के अनुसार नियंत्रित कर सकता है। हालांकि भारत ने इन आरोपों पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
भारत पश्चिमी नदियों के पानी का अधिकतम उपयोग करने के लिए कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है। इनमें चिनाब-व्यास लिंक परियोजना सबसे ज्यादा चर्चा में है। पाकिस्तान का दावा है कि इस परियोजना के जरिए करीब 19 लाख एकड़-फीट पानी मोड़ने की तैयारी की जा रही है। इस कारण वहां यह आशंका बढ़ गई है कि भविष्य में सिंधु बेसिन पर उसकी निर्भरता प्रभावित हो सकती है।
पाकिस्तान की लगभग 24 करोड़ आबादी सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। देश की 80 प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि की सिंचाई इसी जल से होती है, जबकि उसकी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि पर आधारित है। इसलिए पानी की उपलब्धता में किसी भी कमी को वहां राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जोड़कर देखा जा रहा है।
पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी, उप-प्रधानमंत्री इशाक डार, जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसद्दिक मलिक और सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने भारत के रुख की आलोचना करते हुए इसे गंभीर मुद्दा बताया है। पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय मंचों और मध्यस्थता के जरिए भी इस विवाद को उठाने की कोशिश कर रहा है।
भारत लगातार यह कहता रहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। नई दिल्ली का स्पष्ट संदेश है कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते। इसी नीति के तहत भारत जल कूटनीति को भी अपनी रणनीतिक नीति का हिस्सा मान रहा है। फिलहाल सिंधु जल समझौते को लेकर दोनों देशों के बीच गतिरोध बना हुआ है। आने वाले समय में यह मुद्दा केवल जल प्रबंधन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत-पाकिस्तान संबंधों और क्षेत्रीय कूटनीति का भी अहम विषय बना रह सकता है।
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