
Khandwa Judge Akshay Dwivedi: आज के दौर में जहां लोग अदनी सी सरकारी नौकरी मिलते ही ठाट-बाठ, नौकर-चाकर और सुख-सुविधाओं के पीछे भागने लगते हैं, वहीं देश की न्यायपालिका में एक ऐसा जज भी है जिसने इस पूरी सोच को हिलाकर रख दिया है। मध्य प्रदेश के खंडवा जिले से सामने आई यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी लग सकती है, लेकिन यह पूरी तरह हकीकत है। अपर सत्र न्यायाधीश (अतिरिक्त जिला जज) अक्षय कुमार द्विवेदी ने न केवल आलीशान सरकारी बंगला और कार लेने से साफ इंकार कर दिया, बल्कि हाई कोर्ट से एक ऐसी गुहार लगा दी जिसने कानूनी गलियारों में तहलका मचा दिया।
जज अक्षय कुमार द्विवेदी की सादगी इस कदर है कि उन्होंने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को बकायदा एक आवेदन सौंपकर अपील की है कि उनका मासिक वेतन घटाकर आधे से भी कम कर दिया जाए। जब विभाग ने उनके अगले तबादले (Transfer) को लेकर उनसे पूछा कि वे अपनी पोस्टिंग कहां चाहते हैं, तो उनका जवाब बेहद चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा, "मुझे देश के किसी भी कोने में भेज दो, मैं वहां भी सरकारी सुविधाएं न के बराबर ही लूंगा।" न्यायाधीश द्विवेदी मूल रूप से रीवा के रहने वाले हैं। पन्ना जिले से ट्रांसफर होकर 26 सितंबर 2014 को उनकी तैनाती खंडवा में हुई थी। पिछले दो साल के कार्यकाल में जिसने भी उनकी कार्यशैली को देखा, वह उनका मुरीद हो गया।
एक न्यायाधीश को मिलने वाले आलीशान बंगले को छोड़कर जज अक्षय कुमार द्विवेदी महज एक छोटे से कमरे में अपना जीवन बसर कर रहे हैं। उन्हें नियम के मुताबिक सरकारी नौकर-चाकर मिले हुए हैं, लेकिन वे अपना खाना खुद अपने हाथों से बनाना पसंद करते हैं। वीआईपी कार और लाल बत्ती के इस दौर में वे रोज अदालत के लिए पैदल ही निकल पड़ते हैं। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि आज के समय में जहां लोग करोड़ों की संपत्ति बटोरने में लगे हैं, वहीं जज अक्षय के पास निजी संपत्ति के नाम पर सिर्फ एक अदद मोबाइल फोन है। यह फोन भी उन्हें उनकी मां ने उपहार में दिया था। उनके पास कोई टेलीफोन कनेक्शन नहीं है और वे इसी एक मोबाइल से दिन में तीन बार अपनी मां से बात करते हैं। उन्होंने आजीवन शादी न करने का फैसला लिया है।
न्यायाधीश अक्षय कुमार द्विवेदी के जज बनने के पीछे की कहानी बेहद भावुक और प्रेरणादायक है। उन्होंने अपने छात्र जीवन का एक किस्सा साझा करते हुए बताया कि बचपन में वे अपनी मां के साथ पैतृक संपत्ति के एक विवाद को लेकर कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटा करते थे। अदालत में मिलने वाली 'तारीख पर तारीख' और व्यवस्था की ढुलमुल नीति से उनकी मां बुरी तरह टूट चुकी थीं और परेशान रहती थीं। जज अक्षय द्विवेदी के शब्द: "मां की वो लाचारी और परेशानी देखकर मैंने उसी वक्त जिद पकड़ ली थी कि मैं वकील बनूंगा। जब वकालत की पढ़ाई पूरी की और कोर्ट में आया, तो देखा कि फैसलों में होने वाली देरी से आम लोगों को कितनी मानसिक पीड़ा और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। बस, उसी दिन ठान लिया कि अब तो जज ही बनना है और लोगों को जल्द से जल्द न्याय दिलाना है।"
अपनी इसी कसम को पूरा करने के लिए जज अक्षय अपनी अदालत में आने वाले मामलों, खासकर जमीन और जायदाद के विवादों का निपटारा बहुत तेजी से करते हैं। दो साल पहले उनकी अदालत में 'इकबाल भूरे खान' का एक बेहद चर्चित मामला आया था, जिसमें कुछ जालसाजों ने इकबाल की जमीन को फर्जी दस्तावेजों के सहारे बेच दिया था। आमतौर पर ऐसे दीवानी मामले सालों-साल खिंचते हैं, लेकिन न्यायाधीश अक्षय ने महज कुछ ही दिनों के भीतर मैराथन सुनवाई कर अपना फैसला सुनाया और पीड़ित परिवार को तुरंत राहत पहुंचाई। तमाम सुख-सुविधाओं और वीआईपी कल्चर को लात मारकर एक कमरे में रहने वाले इस जज ने साबित कर दिया है कि न्याय की कुर्सी पर बैठने के लिए बड़ी गाड़ियों की नहीं, बल्कि बड़े और ईमानदार दिल की जरूरत होती है।
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