
Lucknow Aliganj Fire Tragedy Update: लखनऊ के अलीगंज इलाके में सोमवार को हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस दर्दनाक हादसे में 15 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। मरने वालों में ज्यादातर स्टूडेंट्स हैं। इस हादसे में आग की लपटों से भी ज्यादा डरावनी वह कहानी है, जो अब जांच में सामने आ रही है। जिस बिल्डिंग में यह हादसा हुआ, उसे कागजों में एक रिहायशी मकान (Residence) के रूप में मंजूरी मिली थी, लेकिन वहां दुकानें, ऑफिस और एक एनीमेशन सेंटर चल रहा था। यही वजह है कि अब यह मामला सिर्फ आग लगने का नहीं, बल्कि नियमों की अनदेखी, सुरक्षा खामियों और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवालों का बन गया है।
अलीगंज के उषा मेहता मार्ग स्थित तीन मंजिला इमारत में सोमवार दोपहर अचानक आग लग गई। देखते ही देखते धुआं और लपटें पूरे भवन में फैल गईं। उस समय बिल्डिंग के अंदर कई छात्र मौजूद थे, जो वहां चल रहे एनीमेशन सेंटर में क्लास कर रहे थे। हादसे के बाद जब जांच शुरू हुई तो पता चला कि जिस इमारत में कमर्शियल गतिविधियां चल रही थीं, उसे मूल रूप से आवासीय भवन के रूप में मंजूरी मिली थी।
लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) और नगर निगम के रिकॉर्ड के अनुसार, इस भवन का नक्शा एक रिहायशी मकान के रूप में पास किया गया था। जांच में सामने आया कि बाद में इसे कथित तौर पर कमर्शियल कॉम्प्लेक्स की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा। इमारत में दुकानें, ऑफिस और शैक्षणिक गतिविधियां संचालित हो रही थीं। शुरुआती जांच में माना जा रहा है कि 2014 के आसपास भवन का उपयोग बदल दिया गया था। जांच एजेंसियों की शुरुआती रिपोर्ट में कई गंभीर सुरक्षा खामियां सामने आई हैं।
1. इमरजेंसी एग्जिट नहीं था
बताया जा रहा है कि भवन में आपातकालीन निकास (Emergency Exit) की व्यवस्था नहीं थी। आग फैलने के दौरान लोगों के पास बाहर निकलने का सुरक्षित विकल्प नहीं था।
2. छत तक जाने का रास्ता बंद था
जांच में यह भी सामने आया कि छत तक पहुंचने का रास्ता अवरुद्ध था। अगर यह रास्ता खुला होता तो कई लोग ऊपर जाकर अपनी जान बचा सकते थे।
3. थंब-इम्प्रेशन लॉक बना जानलेवा
सबसे चौंकाने वाला खुलासा मेन एंट्री गेट को लेकर हुआ है। जानकारी के मुताबिक, ऑफिस में प्रवेश के लिए थंब-इम्प्रेशन आधारित इलेक्ट्रॉनिक लॉक सिस्टम लगाया गया था। आग लगने के दौरान बिजली और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम प्रभावित हो गया। इसके बाद ऑटोमैटिक लॉक जाम हो गया और अंदर मौजूद कई लोग बाहर नहीं निकल सके।
इस मामले का एक और बड़ा पहलू यह है कि भवन को लेकर पहले भी कार्रवाई हो चुकी थी। LDA ने 2016 में कथित अनधिकृत निर्माण को लेकर कार्रवाई शुरू की थी। 10 मई 2016 को ध्वस्तीकरण (Demolition) का आदेश भी जारी किया गया था। हालांकि बाद में सुनवाई का अवसर नहीं मिलने और अन्य कानूनी तर्कों के आधार पर यह आदेश वापस ले लिया गया। अब हादसे के बाद यह सवाल उठ रहा है कि अगर उस समय निर्माण और उपयोग की पूरी जांच होती, तो क्या आज 15 लोगों की जान बचाई जा सकती थी?
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