क्या आप जानते हैं? यूपी में है एक रहस्यमयी मेंढ़क मंदिर, जहां शिवलिंग बदलता है रंग

Published : Feb 03, 2026, 01:09 PM IST

Mendhak Mandir Lakhimpur Kheri: लखीमपुर खीरी का विश्व प्रसिद्ध मेंढ़क मंदिर अपने रहस्यों और अनोखी बनावट के लिए जाना जाता है। यहां शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है। मगरमच्छ, मेंढ़क और कमल पर स्थापित शिवलिंग की कहानी जानिए।

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लखीमपुर खीरी का मेंढ़क मंदिर, जहां शिवलिंग दिन में तीन बार बदलता है रंग

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में एक ऐसा शिव मंदिर है, जिसकी चर्चा सिर्फ आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके रहस्य और अनोखी संरचना इसे देशभर में खास बनाती है। जिला मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर दूर, सीतापुर मार्ग पर ओयल में स्थित यह विश्व विख्यात शिव मंदिर ‘मेंढ़क मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर जितना प्राचीन है, उतना ही रहस्यमय भी, जहां स्थापित शिवलिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है।

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19वीं सदी में हुआ था मंदिर का निर्माण

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1860 से 1870 के बीच राजा बखत सिंह ने करवाया था। मंदिर में स्थापित शिवलिंग नर्मदा नदी से लाकर स्थापित किया गया था, जिसे लेकर आज भी श्रद्धालुओं में विशेष आस्था है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह शिवलिंग सामान्य नहीं, बल्कि दिव्य ऊर्जा से युक्त है।

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मगरमच्छ, मेंढ़क और कमल पर विराजमान शिवलिंग

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अद्भुत स्थापत्य कला है। यहां शिवलिंग को एक विशेष संरचना पर स्थापित किया गया है, जहां सबसे नीचे मगरमच्छ, उसके ऊपर मेंढ़क, फिर कमल और सबसे ऊपर शिवलिंग विराजमान है। मंदिर के शीर्ष पर नटराज की मूर्ति के साथ सूर्य चक्र स्थापित है। मान्यता है कि यह सूर्य चक्र सूर्य की गति के साथ घूमता है, इसी वजह से मंदिर को मेंढ़क मंदिर कहा जाने लगा।

स्थानीय श्रद्धालुओं और साधु-संतों का विश्वास है कि इस पौराणिक शिवधाम में दर्शन करने मात्र से ही जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव यहां अपने भक्तों की हर विपत्ति से रक्षा करते हैं और मनोकामनाएं पूरी करते हैं। यही कारण है कि सावन के महीने में और विशेषकर सोमवार को यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

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चार स्तंभ, सुरक्षा और साधना का अद्भुत संगम

मंदिर के चारों ओर सीढ़ियां बनाई गई हैं और इसकी सुरक्षा के लिए चार विशाल स्तंभ स्थापित किए गए हैं। इन स्तंभों तक पहुंचने के लिए टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियां बनी हैं, जो अपने आप में अनोखी हैं। पुराने समय में इन स्तंभों से मंदिर की निगरानी की जाती थी। मंदिर की दीवारों पर की गई तांत्रिक क्रियाओं से जुड़ी नक़्क़ाशी और देवी-देवताओं की शिल्पकला इसे और भी खास बनाती है। मुख्य द्वार पर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित है, जो इस मंदिर की कलात्मक पहचान को और मजबूत करती है।

करीब 100 फीट ऊंचा यह मंदिर चारों ओर मजबूत दीवारों से घिरा हुआ है। सुरक्षा कारणों से हाल ही में इसका मुख्य द्वार बंद कर दिया गया है और श्रद्धालुओं के प्रवेश के लिए एक सीढ़ीनुमा नया मार्ग बनाया गया है। मंदिर परिसर में पहुंचते ही चारों ओर खिले फूलों और हरियाली से सजा बगीचा श्रद्धालुओं को शांति का अनुभव कराता है।

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टूरिज्म हब बनाने की तैयारी में पुरातत्व विभाग

यह मंदिर इसलिए भी अनोखा माना जाता है, क्योंकि कालेश्वर भगवान के मंदिर में खड़ी कामधेनु के बाद, यहां भी खड़ी कामधेनु की प्रतिमा देखने को मिलती है। राजाओं द्वारा निर्मित इस मंदिर की परंपरा और प्रतिष्ठा को उनके वंशज आज भी संजोए हुए हैं। मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक विशेषताओं को देखते हुए पुरातत्व विभाग इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की तैयारी कर रहा है। साथ ही मंदिर से जुड़े रहस्यों पर शोध भी किया जा रहा है और इसके जीर्णोद्धार की दिशा में काम चल रहा है।

आस्था, इतिहास और रहस्य का यह संगम मेंढ़क मंदिर को सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्थापित करता है, जिसे एक बार देखना हर श्रद्धालु और पर्यटक के लिए खास अनुभव बन जाता है।

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