
Monsoon 2026 Update: दक्षिण-पश्चिम मॉनसून ने गुरुवार, 4 जून 2026 को आधिकारिक रूप से केरल में दस्तक दे दी है। हालांकि, इस बार मॉनसून अपनी सामान्य तारीख 1 जून की तुलना में तीन दिन देरी से पहुंचा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि मॉनसून अब तेजी से आगे बढ़ रहा है और अगले दो से तीन दिनों में देश के कई अन्य हिस्सों तक पहुंच सकता है।
IMD के मुताबिक, दक्षिण-पश्चिम मॉनसून अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के बड़े क्षेत्रों को पहले ही कवर कर चुका है। मौसम विभाग का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियां मॉनसून के और आगे बढ़ने के लिए अनुकूल बनी हुई हैं।
मौसम विभाग के अनुसार, 4 जून तक दक्षिण-पश्चिम मॉनसून जिन क्षेत्रों में पहुंच चुका है, उनमें
IMD के अनुसार, 4 जून को मॉनसून की उत्तरी सीमा 14°N/60°E, 13.5°N/65°E, 13°N/70°E, मंगलुरु, ऊटाकामंडम, कोडाइकनाल, तूतीकोरिन, 8.8°N/79°E, 11°N/83°E, 14.5°N/87°E, 17.5°N/90°E, 20°N/93°E, 22°N/95°E से होकर गुजर रही थी।
IMD ने बताया कि अगले दो से तीन दिनों के दौरान मौसम की परिस्थितियां मॉनसून के और विस्तार के लिए अनुकूल बनी रहेंगी। इस दौरान मॉनसून निम्न क्षेत्रों में आगे बढ़ सकता है।
IMD के अनुसार, पिछले दो दिनों के दौरान दक्षिण-पूर्व अरब सागर के ऊपर संवहनी बादलों (Convective Clouds) की गतिविधि में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। इसके अलावा समुद्र तल से लगभग 4.5 किलोमीटर ऊंचाई तक तेज पछुआ हवाएं सक्रिय रहीं। मौसम विभाग ने बताया कि केरल में पिछले दो दिनों के दौरान व्यापक स्तर पर बारिश हुई, जबकि कई स्थानों पर भारी वर्षा भी दर्ज की गई। यही परिस्थितियां दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के आगमन के लिए जरूरी मानी जाती हैं।
IMD के मुताबिक, निचले स्तर पर पछुआ हवाएं लगभग 20 से 25 नॉट्स की रफ्तार से चल रही थीं। इन मजबूत हवाओं और लगातार हो रही बारिश ने मॉनसून को केरल में प्रवेश करने के लिए अनुकूल माहौल प्रदान किया। मौसम विभाग ने अपने बयान में कहा कि मॉनसून की शुरुआत के लिए निर्धारित सभी आवश्यक शर्तें पूरी हो चुकी थीं। इसी आधार पर 4 जून 2026 को केरल में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के आगमन की घोषणा की गई।
इस बीच, 2 जून को प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार अल नीनो की परिस्थितियां विकसित हो रही थीं। इसके कारण वैश्विक तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो की स्थिति आने वाले महीनों में दुनिया के कई हिस्सों में मौसम संबंधी चरम घटनाओं के जोखिम को बढ़ा सकती है। इसका असर भारत के मानसून और वर्षा वितरण पर भी पड़ सकता है।
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