
नई दिल्ली: पिछले दो हफ़्तों में भारतीय राजनीति ने एक ऐसा अप्रत्याशित मोड़ ले लिया है, जिसकी कल्पना एक महीने पहले शायद ही किसी ने की होगी। ताजा घटनाक्रम ने सत्ता और विपक्ष के समीकरणों को पूरी तरह बदल देने की संभावनाएं पैदा कर दी हैं। दिल्ली के सियासी गलियारों में एक गहरा सस्पेंस तैर रहा है। जो विपक्ष अप्रैल के महीने में एकजुट होकर सरकार का रास्ता रोक रहा था, आज उसी के पैर उखड़ते दिख रहे हैं। सवाल यह है कि क्या मॉनसून सत्र में देश का संविधान बदलने वाला कोई बड़ा खेल होने जा रहा है? क्या विपक्ष के भीतर बढ़ती बगावत NDA को वह ताकत दे देगी जिसकी उसे लंबे समय से तलाश थी?
याद करिए अप्रैल का वो महीना, जब महिला आरक्षण पैकेज का हिस्सा रहा 'परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन बिल' लोकसभा में गिर गया था। विपक्ष की एकजुट ताकत ने सरकार के मंसूबों पर पानी फेर दिया था और यह बिल 54 वोटों के अंतर से रुक गया था। लेकिन राजनीति में कोई भी हार स्थाई नहीं होती। सूत्रों की मानें तो अब इस बिल को दोबारा पेश करने की तैयारी है, और इस बार नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं। इस पूरे खेल के पीछे बंगाल और महाराष्ट्र में परदे के पीछे चल रही एक बहुत बड़ी सियासी उथल-पुथल है।
4 मई को तृणमूल कांग्रेस (TMC) की हार के बाद दीदी का किला ढहता हुआ नजर आ रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में शुरू हुई फूट अब संसद तक पहुँच चुकी है। तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने एक बड़ा गुट बनाकर पार्टी से नाता तोड़ लिया है। इन बागियों ने अपने गुट का विलय 'नेशनलिस्ट सिटिज़न पार्टी ऑफ़ इंडिया' (NCPI) में कर लिया है। यह वही पार्टी है जिसने त्रिपुरा में बेहद खराब शुरुआत की थी, लेकिन अब इन 20 सांसदों के दम पर यह सीधे संसद पहुँचकर NDA का हिस्सा बनने जा रही है।
बंगाल के बाद अगला नंबर महाराष्ट्र का है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) इस समय अपने सबसे गहरे संकट से गुजर रही है। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, ठाकरे के नौ लोकसभा सांसदों में से छह सांसद कभी भी पार्टी का दामन छोड़ सकते हैं। सस्पेंस इस बात को लेकर है कि ये छह सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल होकर NDA के कुनबे को और मजबूत करने वाले हैं।
अब बात करते हैं उस असली खेल की, जो संसद के भीतर होने वाला है। संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए सरकार को दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। लोकसभा की प्रभावी संख्या के हिसाब से यह आंकड़ा 360 बैठता है।
कागज़ पर सरकार को अभी 42 और सांसदों की ज़रूरत है। लेकिन असली पेच "मौजूद और वोट करने वाले" सदस्यों के नियम में है। अगर बजट सत्र की तरह 12 सांसद अनुपस्थित रहते हैं, तो बहुमत का आंकड़ा 352 पर आ जाएगा। ऐसे में सरकार को सिर्फ 54 अतिरिक्त वोटों की दरकार होगी।
संसद का संभावित समीकरण (लोकसभा):
इस पूरे ड्रामे के सबसे बड़े टर्निंग पॉइंट तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन हो सकते हैं। कांग्रेस से अनबन के बाद DMK अब विपक्षी 'INDIA' गठबंधन से बाहर है। खबर है कि केंद्र सरकार परदे के पीछे DMK के साथ बातचीत कर रही है। अगर DMK की मांगें मान ली जाती हैं, तो उसके 22 सांसद सरकार के पक्ष में आ जाएंगे। इसके बाद सरकार बहुमत से सिर्फ 6 वोट दूर रह जाएगी। ये आखिरी छह वोट कहां से आएंगे? उत्तर प्रदेश के मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी (SP) की तरफ इशारा करके सस्पेंस और बढ़ा दिया है। हालांकि, अगले साल होने वाले यूपी चुनाव से पहले सपा में सेंध लगाना आसान नहीं होगा। इसीलिए, बीजेपी के रणनीतिकारों की नजर 'INDIA' गठबंधन की कुछ अन्य छोटी क्षेत्रीय पार्टियों पर भी टिकी हुई है।
सिर्फ लोकसभा ही नहीं, बल्कि राज्यसभा में भी दो-तिहाई (164 वोट) के लिए बिसात बिछ चुकी है। 245 सदस्यों वाली राज्यसभा में NDA के पास अपने 150 सांसद हैं। अगर यहां भी DMK के 8 सांसदों का साथ मिल जाता है, तो यह संख्या 158 हो जाएगी। इसके बाद तृणमूल के तीन सांसदों के इस्तीफे से खाली हुई सीटों पर उपचुनाव और कुछ निर्दलीय व छोटी पार्टियों के सहारे सरकार आसानी से जादुई आंकड़े को छू लेगी।
अगर यह पूरा समीकरण सही बैठ जाता है, तो आगामी मॉनसून सत्र भारतीय संसदीय इतिहास का सबसे ऐतिहासिक सत्र बन सकता है। सरकार न सिर्फ महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को दोबारा पास करा लेगी, बल्कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि देश में हमेशा के लिए चुनाव का तरीका बदलने वाला "एक देश, एक चुनाव" बिल भी इसी सत्र में मेज पर आ सकता है। अब देखना यह है कि विपक्ष इस महा-घेराबंदी से खुद को कैसे बचाता है!
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