
Pakistan Motorway Gangrape Case: पाकिस्तान की एक उच्च अदालत से एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला आया है, जिसने कुछ साल पहले पूरे देश को झकझोर देने वाले एक खौफनाक कांड के गुनाहगारों के अंजाम पर मुहर लगा दी है। लाहौर हाई कोर्ट (LHC) ने बुधवार को एक बड़ा कदम उठाते हुए उन दो दरिंदों की मौत की सजा को बरकरार रखा है, जिन्होंने लाहौर के पास एक हाईवे पर एक फ्रांसीसी महिला पर्यटक के साथ उसके ही मासूम बच्चों के सामने दरिंदगी की सारी हदें पार कर दी थीं। अदालत के इस फैसले के बाद अब दोषी आबिद अली और शफ़क़त अली का फांसी के फंदे तक पहुँचना तय माना जा रहा है।
यह रूह कंपा देने वाली कहानी 9 सितंबर, 2020 की उस काली रात से शुरू होती है, जब पाकिस्तानी मूल की एक फ्रांसीसी महिला अपने तीन मासूम बच्चों के साथ सियालकोट-लाहौर मोटरवे पर सफर कर रही थी। देर रात के सन्नाटे में अचानक उसकी गाड़ी का पेट्रोल खत्म हो गया और पूरी गाड़ी एक सूने रास्ते पर खड़ी हो गई। महिला ने समझदारी दिखाते हुए तुरंत कार के सारे दरवाजे अंदर से लॉक कर लिए और गाड़ी के भीतर ही बैठकर मदद का इंतजार करने लगी। उसे अंदाजा भी नहीं था कि अंधेरे में छिपे दो भेड़िए उसकी तरफ बढ़ रहे हैं।
सस्पेंस और दहशत तब चरम पर पहुँच गई जब आबिद और शफ़क़त ने सुनसान सड़क पर अकेली खड़ी कार को निशाना बनाया। मदद करने के बजाय, इन हैवानों ने कड़कड़ाती रात में कार की खिड़की का शीशा तोड़ दिया। महिला चीखती रही, लेकिन उन्होंने उसे जबरन कार से बाहर खींच लिया। इसके बाद जो हुआ, उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। बंदूक की नोक पर, उसके रोते-बिलखते तीन बच्चों के सामने ही उन दोनों ने महिला के साथ सामूहिक बलात्कार (गैंगरेप) किया। दरिंदगी यहीं खत्म नहीं हुई; भागने से पहले उन्होंने उस बेबस परिवार से सारी नकदी, गहने और बैंक कार्ड भी लूट लिए।
इस घटना के सामने आते ही पूरे पाकिस्तान में आक्रोश की आग भड़क उठी। लोग सड़कों पर उतर आए और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार के खिलाफ उग्र प्रदर्शन होने लगे। जनता का गुस्सा तब और ज्यादा भड़क गया जब तत्कालीन लाहौर पुलिस प्रमुख (कमिश्नर) उमर शेख ने एक बेहद गैर-जिम्मेदाराना बयान दे डाला। उन्होंने पीड़िता पर ही सवाल उठाते हुए कह दिया कि 'महिला रात में अकेले सफर क्यों कर रही थी' और 'उसे कोई दूसरा सुरक्षित रास्ता चुनना चाहिए था।' इस असंवेदनशील टिप्पणी ने पूरे देश में गुस्से का ऐसा ज्वालामुखी भड़काया कि सरकार बैकफुट पर आ गई।
दबाव में आई पुलिस और जांच एजेंसियों ने इन अज्ञात हमलावरों को ढूँढने के लिए एक बेहद गुप्त और बड़ा ऑपरेशन चलाया। सिर्फ कुछ ही दिनों के भीतर, जांचकर्ताओं ने उस इलाके के मोबाइल फोन डेटा और टावर लोकेशन की मदद से संदिग्धों का घेरा छोटा किया। आखिरकार, घटनास्थल से मिले पुख्ता DNA सबूतों ने आबिद और शफ़क़त का राजफाश कर दिया। बाद में पीड़ित महिला ने भी कानूनी कार्यवाही के दौरान दोनों की पहचान की, और शफ़क़त अली ने एक मजिस्ट्रेट के सामने रोते हुए अपना जुर्म कबूल कर लिया। मार्च 2021 में एक आतंकवाद-रोधी अदालत ने इन्हें फांसी और उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दोनों दोषियों ने लाहौर हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। उनके वकीलों ने सस्पेंस बनाने की कोशिश करते हुए दलील दी कि पुलिस की जांच में कई खामियां और विसंगतियां हैं, इसलिए सजा को रद्द किया जाए। हालांकि, सरकारी अभियोजन पक्ष ने कोर्ट के सामने अकाट्य वैज्ञानिक सबूत और DNA रिपोर्ट पेश कर दी। पाकिस्तानी मीडिया आउटलेट 'डॉन' के अनुसार, जजों ने माना कि मामले के सबूत इतने मजबूत हैं कि इन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। अदालत ने दोषियों की अंतिम अपील को सिरे से खारिज करते हुए उनकी मौत की सजा को बरकरार रखा है, जिससे अब इस खौफनाक इंसाफ का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
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