
PhD Holder Cab Driver: यह कहानी किसी फिल्म की भावुक पटकथा जैसी लग सकती है, लेकिन यह हमारे देश के शिक्षा तंत्र की एक ऐसी कड़वी और झकझोर देने वाली हकीकत है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस व्यक्ति ने अंग्रेजी साहित्य (English Literature) में पीएचडी (PhD) की हो, जिसके पास पोस्ट-ग्रेजुएशन की कई डिग्रियां हों, और जो राज्य के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेजों में से एक में पढ़ाता हो, वह अपने परिवार का पेट पालने के लिए सड़कों पर कैब दौड़ा रहा हो? जी हां, यह कहानी है तमिलनाडु के डॉ. ई. तिरुमलाई राजा की, जिनका संघर्ष आज सोशल मीडिया पर वायरल होकर हर संवेदनशील नागरिक को सोचने पर मजबूर कर रहा है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर वायरल हुई एक पोस्ट ने तमिलनाडु के एक शिक्षाविद् की जिंदगी के उस संघर्ष को सामने ला दिया है, जिसे जानकर लोग हैरान हैं। पोस्ट में दावा किया गया है कि डॉ. ई. तिरुमलाई राजा, जो इंग्लिश लिटरेचर में PhD होल्डर हैं, आज अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए कैब ड्राइवर का काम करने को मजबूर हैं। यह पोस्ट X यूज़र अनंत रूपनागुडी ने साझा की, जिसमें उन्होंने अकादमिक समुदाय और संबंधित संस्थानों से अपील की कि डॉ. राजा को उनकी योग्यता के अनुरूप स्थायी शिक्षण पद दिलाने में मदद की जाए। पोस्ट वायरल होने के बाद हजारों लोगों ने इस मामले पर प्रतिक्रिया दी और भारत में कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों की स्थिति पर सवाल उठाए।
डॉ. ई. तिरुमलाई राजा का शैक्षणिक सफरनामा इतना शानदार है कि किसी भी बड़ी यूनिवर्सिटी का सीवी (CV) उनके आगे फीका पड़ जाए। उनकी शैक्षणिक योग्यताओं की सूची कुछ इस प्रकार है:
इसके अलावा वे एक कुशल मोटिवेशनल स्पीकर, एग्जाम सेल कोऑर्डिनेटर, एडिटर और कम्युनिकेशन स्किल्स के बेहतरीन ट्रेनर भी हैं। लेकिन विडंबना देखिए, जब वे चेन्नई की सड़कों पर कैब लेकर निकलते हैं, तो यात्री यह कभी नहीं सोच पाते कि ड्राइवर की सीट पर बैठा शख्स असल में ज्ञान का एक अथाह समंदर है।
This is the profile of Mr Tirumalai Raja, whose story I had posted about how, as a Ph.D in English Literature, he still has to drive a cab to supplement his meagre income as a guest lecturer in Presidency College.
Please zoom in to note his academics and some achievements, which… https://t.co/Ni71rcr0Oz pic.twitter.com/rfY7znnr90— Ananth Rupanagudi (@AnanthOnTrack) July 13, 2026
डॉ. राजा की डॉक्टोरल रिसर्च का विषय बेहद दिलचस्प था-"इंडो-एंगलियन राइटिंग में ब्लैक ह्यूमर" (Black Humor in Indo-Anglian Writing)। किसे पता था कि साहित्य में विडंबना और काले हास्य पर शोध करने वाले इस विद्वान की अपनी वास्तविक जिंदगी ही एक ऐसा क्रूर मजाक बन जाएगी। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों में रिसर्च पेपर पढ़े हैं, यूनिवर्सिटीज के लिए पेपर सेटर के रूप में काम किया है, और उनके कई लेख यूजीसी (UGC) लिस्टेड जर्नल्स में पब्लिश हो चुके हैं। लेकिन इस उच्च दर्जे की अकादमिक काबिलियत का मोल सिस्टम ने बेहद मामूली लगाया।
वर्तमान में डॉ. राजा चेन्नई के मशहूर प्रेसीडेंसी कॉलेज में कॉन्ट्रैक्ट लेक्चरर के तौर पर पढ़ा रहे हैं, जहां उन्हें महीने के महज 30,000 रुपये मिलते हैं। इससे पहले वे नमक्कल में असिस्टेंट प्रोफेसर थे, जहां उनकी सैलरी और भी कम-सिर्फ 20,000 रुपये थी। महंगाई के इस दौर में इतनी मामूली रकम के साथ महानगर में खुद का गुजारा करना और नमक्कल में रह रहे अपने परिवार (पत्नी और स्कूल जाने वाले दो बच्चों) की जरूरतों को पूरा करना पूरी तरह असंभव है। यही वजह है कि वे दिन में कॉलेज में चॉक उठाते हैं और खाली समय में हाथों में स्टीयरिंग थामकर कॉल टैक्सी ड्राइवर की ड्यूटी करते हैं।
डॉ. राजा के इस अदृश्य संघर्ष को दुनिया के सामने लाने का काम एक्स (X) यूजर अनंत रूपनागुडी ने किया। उन्होंने डॉ. राजा की कहानी और उनके बेमिसाल सीवी को साझा करते हुए अकादमिक कम्युनिटी से अपील की कि इस योग्य शिक्षक को एक सम्मानजनक और पक्की (Permanent) नौकरी दिलाने में मदद की जाए। "यह केवल डॉ. तिरुमलाई राजा की कहानी नहीं है, बल्कि भारत के उन हजारों एड-हॉक, गेस्ट और कॉन्ट्रैक्ट टीचर्स की सामूहिक दास्तान है जो देश का भविष्य संवारते हैं, लेकिन खुद अंधकार में जीने को मजबूर हैं।" यह वायरल पोस्ट भारतीय शिक्षा व्यवस्था में कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले शिक्षकों के शोषण और उनके सामने आने वाली गंभीर आर्थिक चुनौतियों की ओर इशारा करती है। सवाल आज भी जस का तस बना हुआ है-क्या डिग्रियों की अंतिम नियति कैब का स्टीयरिंग व्हील ही बनकर रह जाएगी, या इस योग्य शिक्षक को उनका असली हक मिलेगा?
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