
PoK Political System Analysis: पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में हाल ही में भड़की भीषण हिंसा, खून-खराबे और 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) के नेतृत्व में हुए विद्रोह ने इस्लामाबाद की रातों की नींद उड़ा दी है। इस अशांति के बीच दुनिया का ध्यान एक ऐसे बुनियादी और रहस्यमयी सवाल पर गया है जो दशकों से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पर्दों के पीछे छिपा हुआ था। सवाल यह है कि अगर PoK पर पाकिस्तान का ही पूरा कंट्रोल है, तो वहां अलग राष्ट्रपति, अलग प्रधानमंत्री, अपनी विधानसभा और अलग झंडा क्यों है? क्या यह सचमुच कश्मीरियों की आज़ादी है या फिर रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय (जीएचक्यू) में बुना गया एक ऐसा खौफनाक चक्रव्यूह है, जिसका मकसद सिर्फ दुनिया की आंखों में धूल झोंकना है? आइए, इस राजनीतिक प्रपंच के पीछे की कड़वी और सनसनीखेज हकीकत से पर्दा उठाते हैं।
इस सस्पेंस को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटकर अगस्त 1947 के दौर में जाना होगा। विभाजन के समय जब महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ कानूनी तौर पर 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर कर दिए, तो पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया। लेकिन कबाली भेष में आई पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर के एक हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया। पाकिस्तान चाहता तो पंजाब, सिंध या बलूचिस्तान की तरह PoK को भी अपना एक प्रांत घोषित कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसके पीछे एक बहुत ही सोची-समझी और चालाक कूटनीतिक चाल थी।
कल मैने POK का ये विडियो पोस्ट करके लिखा
हमारे चचा नेहरु ने ये जगह पाकिस्तान को तोहफ़े में दे दी…
इसपर विरोधियों के कमेंट देखो….
•• नेहरू ने दिया तो मोदी को बोलो वापस ले आए
•• पहले जो है उसे तो सँभाल लो…
•• लद्दाख जैसा इसका भी हाल होता
•• अरुणाचल प्रदेश बचा लो… pic.twitter.com/RBsJiVY6au— kapil bishnoi (@Kapil_Jyani_) June 9, 2026
एक्सपर्ट्स और भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन के मुताबिक: "पाकिस्तान को डर था कि अगर उसने PoK या गिलगित-बाल्टिस्तान को अपना वैध प्रांत घोषित कर दिया, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पूरे जम्मू-कश्मीर पर उसका दावा कानूनी रूप से हमेशा के लिए कमजोर हो जाएगा।" इसीलिए, दुनिया के सामने खुद को 'दूध का धुला' साबित करने और संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर विवाद को जिंदा रखने के लिए पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को "आज़ाद जम्मू और कश्मीर" का फर्जी नाम दिया और इसे एक स्वतंत्र राज्य जैसा मुखौटा पहना दिया।
कागज़ों और फाइलों पर तो PoK में लोकतंत्र का एक शानदार नाटक देखने को मिलता है। वहां के लोग वोट डालकर अपने विधायक चुनते हैं, वहां एक प्रधानमंत्री होता है जो सरकार चलाता है, और एक राष्ट्रपति होता है जो संवैधानिक प्रमुख होता है। वहां अपनी अदालतें हैं, अपनी नौकरशाही है और एक अलग झंडा भी है जो पाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज के साथ फहराया जाता है। लेकिन इस पूरी व्यवस्था का रिमोट कंट्रोल मुज़फ़्फ़राबाद (PoK की राजधानी) में नहीं, बल्कि इस्लामाबाद और रावलपिंडी के हुक्मरानों के हाथ में होता है।
PoJK is on fire..
Despite Pák military's atrocities and massacre in POJK, the brave protestors are undeterred & continue to fight for their rights & freedom..
Pákistan is unable to handle the situation which has already gone out of its hands.#PoJKBleeds#Rawlakot… pic.twitter.com/5aZIlWe4Oq— Fatima Dar (@FatimaDar_jk) June 11, 2026
इस दिखावे की हकीकत को आप इन तीन कड़वे तथ्यों से समझ सकते हैं:
इस तथाकथित 'आज़ाद' मुल्क का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला विरोधाभास इसकी चुनावी प्रक्रिया और नेताओं द्वारा ली जाने वाली शपथ में छिपा है। पाकिस्तान के अन्य प्रांतों (जैसे पंजाब या केपीके) में चुनाव लड़ने के लिए किसी 'वैचारिक वफादारी' की जरूरत नहीं होती, लेकिन PoK का नियम बेहद क्रूर है। वहां किसी भी नेता, जज या संवैधानिक पद पर बैठने वाले व्यक्ति को चुनाव लड़ने से पहले यह कसम खानी पड़ती है कि वह कश्मीर के पाकिस्तान में विलय का समर्थन करता है। अगर कोई कश्मीरी यह कह दे कि वह पाकिस्तान के साथ नहीं रहना चाहता, तो उसे चुनाव लड़ने या सरकारी नौकरी पाने का कोई अधिकार नहीं है। यह शर्त हर उस आवाज को कुचल देती है जो सचमुच आज़ादी चाहती है।
इसके अलावा, इस्लामाबाद ने PoK की विधानसभा में 'शरणार्थियों' के नाम पर कुछ सीटें आरक्षित कर रखी हैं। इन सीटों पर वोटिंग PoK के लोग नहीं करते, बल्कि पाकिस्तान के विभिन्न शहरों (जैसे कराची, लाहौर) में रहने वाले लगभग 4.34 लाख लोग करते हैं। जानकारों का कहना है कि इन सीटों का इस्तेमाल पाकिस्तान का सत्ता-तंत्र मुज़फ़्फ़राबाद में अपनी मनपसंद कठपुतली सरकार बनाने और चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए करता है।
दशकों से चला आ रहा पाकिस्तान का यह प्रपंच अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। महंगाई, आटे का अकाल और बिजली की भारी किल्लत से जूझ रहे PoK के आम नागरिकों को अब समझ आ चुका है कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और झंडे का यह तमाशा सिर्फ उनके शोषण को छिपाने का एक जरिया था। हालिया विरोध प्रदर्शनों में जब पाकिस्तानी रेंजरों की गोलियों से कम से कम 27 कश्मीरियों की मौत हुई, तो यह साफ हो गया कि पाकिस्तान के लिए PoK की जमीन तो उसकी जागीर है, लेकिन वहां के लोग सिर्फ गुलाम हैं। भले ही PoK के प्रधानमंत्री फैसल मुमताज़ राठौर प्रदर्शनकारियों से बातचीत की भीख मांग रहे हों, लेकिन कश्मीरी अवाम अब जान चुकी है कि उनके असली शोषक रावलपिंडी के सैन्य बैरकों में बैठे हैं। आज़ादी का यह मुखौटा अब पूरी तरह से तार-तार हो चुका है।
Asianet News Hindi पर पढ़ें देशभर की सबसे ताज़ा National News in Hindi, जो हम खास तौर पर आपके लिए चुनकर लाते हैं। दुनिया की हलचल, अंतरराष्ट्रीय घटनाएं और बड़े अपडेट — सब कुछ साफ, संक्षिप्त और भरोसेमंद रूप में पाएं हमारी World News in Hindi कवरेज में। अपने राज्य से जुड़ी खबरें, प्रशासनिक फैसले और स्थानीय बदलाव जानने के लिए देखें State News in Hindi, बिल्कुल आपके आसपास की भाषा में। उत्तर प्रदेश से राजनीति से लेकर जिलों के जमीनी मुद्दों तक — हर ज़रूरी जानकारी मिलती है यहां, हमारे UP News सेक्शन में। और Bihar News में पाएं बिहार की असली आवाज — गांव-कस्बों से लेकर पटना तक की ताज़ा रिपोर्ट, कहानी और अपडेट के साथ, सिर्फ Asianet News Hindi पर।