कौन है तेजस्वी कुमारी जोधा? जिसने महज 13 साल की उम्र में तोड़ी राजस्थान की शदियों पुरानी शाही परंपरा

Published : Jun 27, 2026, 09:01 AM ISTUpdated : Jun 27, 2026, 09:06 AM IST
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सार

राजस्थान के पाली स्थित खेरवागढ़ में 13 वर्षीय तेजस्वी कुमारी जोधा पहली महिला वारिस बनीं। 65 साल बाद हुई 'पाग का दस्तूर' रस्म ने राजपूत परंपरा में बड़ा बदलाव लाते हुए लैंगिक समानता की नई मिसाल पेश की। 

Tejasvi Kumari Jodha: राजस्थान के पाली जिले के खेरवा गांव में एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला लिया गया, जिसने वर्षों से चली आ रही राजपूत उत्तराधिकार की परंपरा को नई दिशा दे दी। सदियों से केवल पुरुषों तक सीमित मानी जाने वाली शाही उत्तराधिकार की रस्म में पहली बार एक 13 वर्षीय किशोरी को परिवार का आधिकारिक वारिस घोषित किया गया। यह निर्णय केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक बदलाव और लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश बनकर उभरा। गुरुवार को आयोजित पारंपरिक "पाग का दस्तूर" समारोह में तेजस्वी कुमारी जोधा को खेरवागढ़ वंश की नई उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार किया गया। उनके पिता हरीश चंद्र जोधा के निधन के बाद यह जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई। समारोह में मौजूद लोगों के लिए यह पल भावुक होने के साथ-साथ ऐतिहासिक भी था।

17वीं सदी के किले में गूंजी नई शुरुआत की कहानी

पूरा आयोजन ऐतिहासिक खेरवा किले में हुआ, जिसे 17वीं सदी का बताया जाता है। सैकड़ों ग्रामीण, समाज के बुज़ुर्ग और परिवार के सदस्य इस विशेष अवसर के गवाह बने। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच तेजस्वी के सिर पर गुलाबी पगड़ी बांधी गई, जिसे परंपरा में नेतृत्व और जिम्मेदारी स्वीकार करने का प्रतीक माना जाता है। पारंपरिक तिलक और अन्य धार्मिक रस्मों के साथ समारोह संपन्न हुआ। बताया गया कि यह विशेष पगड़ी परंपरा के अनुसार जोधपुर-मारवाड़ के पूर्व शाही परिवार की ओर से भेजी गई थी। वर्षों बाद आयोजित इस रस्म ने पूरे इलाके का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

65 साल बाद टूटी परंपरा, आखिर क्यों लिया गया यह बड़ा फैसला?

समुदाय के वरिष्ठ लोगों के अनुसार परिवार में पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण लगभग 65 वर्षों से "पाग का दस्तूर" आयोजित नहीं किया गया था। इस बार परिवार और समाज के बुज़ुर्गों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया कि परंपरा को समाप्त करने के बजाय समय के अनुरूप बदला जाए। इसी सोच के तहत तेजस्वी कुमारी को उत्तराधिकारी घोषित किया गया। यह निर्णय इस बात का संकेत माना जा रहा है कि समाज अब परंपराओं को पूरी तरह छोड़ने के बजाय उन्हें बदलते समय के साथ संतुलित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

 

 

पढ़ाई भी जारी, जिम्मेदारियां भी निभाने का संकल्प

सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली तेजस्वी ने समारोह के बाद कहा कि उनकी पहली प्राथमिकता शिक्षा रहेगी, लेकिन साथ ही वह परिवार और गांव के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी पूरी निष्ठा से निभाएंगी। उन्होंने अपने पिता के सपनों को आगे बढ़ाने और गांव के विकास के लिए कार्य करने की इच्छा भी व्यक्त की। उनका यह बयान ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बन गया। लोगों का कहना है कि कम उम्र में मिली यह जिम्मेदारी आने वाले समय में तेजस्वी के व्यक्तित्व को और मजबूत बनाएगी।

'पाग का दस्तूर': क्या है वो रस्म जिसने बदल दिया इतिहास?

राजपूत समाज में "पाग का दस्तूर" एक बेहद पवित्र और महत्वपूर्ण रस्म मानी जाती है। जब भी परिवार के मुखिया का निधन होता है, तो उनकी पगड़ी (पाग) उनके उत्तराधिकारी को सौंपी जाती है, जो नेतृत्व और जिम्मेदारी के हस्तांतरण का प्रतीक है। जोधपुर-मारवाड़ साम्राज्य के अधीन रहे इन इलाकों में यह प्रथा हमेशा से केवल और केवल पुरुष वारिसों तक ही सीमित थी। लेकिन इस बार नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था। खेरवागढ़ वंश के मुखिया हरीश चंद्र जोधा के असामयिक निधन के बाद पूरा परिवार गहरे शोक में था। उनका कोई बेटा नहीं था, जिसके कारण पिछले 65 वर्षों से इस भव्य किले में यह समारोह आयोजित ही नहीं हो सका था। लेकिन इस बार इस गतिरोध को तोड़ने का एक साहसी फैसला लिया गया।

वैदिक मंत्रोच्चार और वो गुलाबी पगड़ी: सस्पेंस से भरा पल

जैसे ही वैदिक मंत्रों का पाठ शुरू हुआ, पूरे किले में एक अलौकिक सन्नाटा पसर गया। 13 साल की तेजस्वी कुमारी जोधा पूरी गरिमा के साथ पुरोहितों के सामने बैठी थीं। तभी वह पल आया जिसका सबको इंतजार था। परंपरा के अनुसार, जोधपुर-मारवाड़ के पूर्व शाही परिवार द्वारा खास तौर पर भेजी गई एक औपचारिक गुलाबी पगड़ी तेजस्वी के सिर पर बांधी गई। यह गुलाबी रंग सिर्फ एक कपड़ा नहीं था, बल्कि यह शोक के अंत और एक बहुत बड़ी रियासती जिम्मेदारी को संभालने का प्रतीक था। जब तेजस्वी के माथे पर राजशाही तिलक लगाया गया, तो वहां मौजूद बुजुर्गों की आंखें भर आईं। यह लैंगिक समानता की दिशा में एक ऐसा दुर्लभ और प्रगतिशील कदम था, जिसकी कल्पना कुछ समय पहले तक असंभव थी।

7वीं क्लास की छात्रा और एक पिता का अधूरा सपना: क्या होगा आगे?

तेजस्वी कुमारी जोधा फिलहाल महज सातवीं कक्षा की छात्रा हैं, लेकिन उनके कंधों पर अब एक पूरे वंश और गांव के विकास की जिम्मेदारी है। इस ऐतिहासिक पल के बाद जब तेजस्वी से बात की गई, तो उनकी बातों में एक गजब का सस्पेंस और आत्मविश्वास नजर आया। उन्होंने बेहद परिपक्वता से कहा कि वह अपनी पढ़ाई को कभी नहीं छोड़ेंगी और शिक्षा पर पूरा ध्यान देने के साथ-साथ उन्हें सौंपी गई इन नई और भारी-भरकम जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाएंगी। तेजस्वी ने संकल्प लिया कि वे अपने दिवंगत पिता के उस अधूरे विज़न और सपनों को पूरा करने की दिशा में काम करेंगी, जो उन्होंने इस गांव के विकास के लिए देखे थे। ग्रामीण इस कदम को बदलते भारत और आधुनिक सामाजिक सोच का एक बेहतरीन उदाहरण मान रहे हैं, जहां परंपराओं को खत्म किए बिना उन्हें समानता के तराजू पर तौला गया है।

क्या बदल रही है राजस्थान की सामाजिक सोच?

स्थानीय लोगों ने इस फैसले को केवल एक पारिवारिक निर्णय नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक दृष्टिकोण का प्रतीक बताया। उनका मानना है कि परंपराओं का सम्मान करते हुए महिलाओं को बराबरी का अधिकार देना समय की मांग है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि इस तरह के फैसले समाज में सकारात्मक संदेश देते हैं और आने वाली पीढ़ियों को यह विश्वास दिलाते हैं कि नेतृत्व क्षमता का संबंध केवल लिंग से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने की योग्यता से है।

एक ऐतिहासिक पल जिसने लिख दिया नया अध्याय

खेरवागढ़ की यह घटना केवल एक शाही परिवार की उत्तराधिकार रस्म नहीं रही, बल्कि उसने सामाजिक बदलाव की नई कहानी भी लिख दी। सदियों से चली आ रही परंपरा में पहली बार किसी बेटी को वारिस घोषित किया जाना इस बात का संकेत है कि बदलाव धीरे-धीरे ही सही, लेकिन समाज की सोच में अपनी जगह बना रहा है। अब लोगों की नजर इस बात पर रहेगी कि तेजस्वी कुमारी अपने पिता की विरासत को किस तरह आगे बढ़ाती हैं और क्या यह ऐतिहासिक कदम भविष्य में अन्य पारंपरिक परिवारों के लिए भी नई मिसाल बनता है।

 

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