
Ram Mandir Donation Case: अयोध्या के राम मंदिर में दान की कथित हेराफेरी का मामला अब केवल कुछ लोगों की संभावित लापरवाही या गलती तक सीमित नहीं रह गया है। इसने देश के सबसे बड़े धार्मिक ट्रस्टों में से एक की व्यवस्था, निगरानी और जवाबदेही को लेकर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच करीब 82.78 करोड़ रुपये का दान मिला। इसके अलावा ट्रस्ट लगभग 2,100 करोड़ रुपये के निवेश का भी प्रबंधन करता है। ऐसे में जांच एजेंसियां अब पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली की गहराई से पड़ताल कर रही हैं। जांच आगे बढ़ने के साथ पांच बड़े सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार, मंदिर परिसर में लगी करीब 40 दान पेटियों से निकाली गई नकदी कई चरणों से होकर गुजरती थी। इसमें दान पेटियों से नकदी निकालना, उसे सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना, छंटाई करना, गिनती करना, नोटों के बंडल तैयार करना और अंत में बैंक में जमा करना शामिल था। विशेष जांच दल (SIT) यह पता लगा रहा है कि इन सभी चरणों में पर्याप्त निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था मौजूद थी या नहीं। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि हर स्तर पर जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से तय थीं या नहीं, ताकि किसी तरह की गड़बड़ी या हेरफेर की संभावना को रोका जा सके।
जांच में नकदी संभालने की तय प्रक्रिया यानी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) को लेकर भी सवाल उठे हैं। जांच के दायरे में ऐसे दावे हैं कि नकदी गिनने वाले कर्मचारियों के लिए बिना जेब वाली वर्दी पहनना अनिवार्य नहीं था। इसके अलावा कर्मचारियों की तलाशी लेने की जिम्मेदारी पुलिस या किसी सरकारी सुरक्षा एजेंसी के बजाय एक निजी सुरक्षा एजेंसी को दी गई थी। अब जांचकर्ता यह देख रहे हैं कि क्या इन व्यवस्थाओं का पालन तय नियमों के अनुसार किया गया था और यदि नहीं, तो इसके पीछे क्या वजह थी।
मंदिर में नकदी गिनने वाले स्थानों पर CCTV कैमरे लगाए गए थे। इसके बावजूद जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या निगरानी व्यवस्था संदिग्ध गतिविधियों को पकड़ने के लिए पर्याप्त थी। जांच में यह बात भी सामने आई है कि CCTV फुटेज करीब 45 दिनों बाद अपने आप ओवरराइट हो जाती थी। इसके साथ ही नकदी की गिनती, दस्तावेजी रिकॉर्ड, ऑडिट ट्रेल और बैंक में जमा हुई राशि के बीच मिलान की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। जांचकर्ता यह पता लगा रहे हैं कि इन व्यवस्थाओं में कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई थी।
इस मामले में एक अहम सवाल यह भी है कि क्या समय रहते मिली चेतावनी पर कार्रवाई नहीं की गई। बैंक सूत्रों के मुताबिक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने मामला सार्वजनिक होने से लगभग तीन महीने पहले नकदी गिनने की प्रक्रिया में संभावित अनियमितताओं की ओर ध्यान दिलाया था। साथ ही कथित तौर पर इस काम से जुड़े कुछ कर्मचारियों में बदलाव की भी सिफारिश की गई थी। अब जांच एजेंसियां यह पता लगा रही हैं कि इन सुझावों पर अमल किया गया था या नहीं। यदि नहीं किया गया, तो उसके पीछे क्या कारण थे।
इस विवाद के बाद उत्तर प्रदेश के अन्य प्रमुख मंदिरों की व्यवस्थाओं पर भी चर्चा शुरू हो गई है। काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी में दान की गिनती मजिस्ट्रेट की निगरानी में होती है। इस दौरान बैंक अधिकारियों और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की मौजूदगी रहती है तथा पूरी प्रक्रिया लगातार CCTV निगरानी में रिकॉर्ड की जाती है। इसी तरह मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि मंदिर और वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में भी दान की गिनती और नकदी प्रबंधन के लिए कई स्तरों वाली निगरानी व्यवस्था लागू है। इसी वजह से जांचकर्ता यह भी देख रहे हैं कि क्या राम मंदिर में अपनाई गई व्यवस्था अन्य बड़े मंदिरों के मुकाबले पर्याप्त थी या उसमें सुधार की जरूरत थी।
जांच एजेंसियों और पूर्व अधिकारियों का मानना है कि जिन धार्मिक संस्थानों में बड़ी मात्रा में जनता का दान आता है, वहां केवल सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच, मजबूत ऑडिट सिस्टम, हर प्रक्रिया का लिखित रिकॉर्ड, लगातार निगरानी और स्पष्ट जवाबदेही भी जरूरी होती है। इसी उद्देश्य से राम मंदिर दान विवाद की जांच अब केवल कथित हेराफेरी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे नकदी प्रबंधन और निगरानी तंत्र की समीक्षा भी की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कहीं प्रक्रियागत चूक हुई थी या नहीं और यदि हुई थी तो उसकी जिम्मेदारी किस पर तय होगी।
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