
सफलता सिर्फ बड़े शहरों या महंगे संसाधनों की मोहताज नहीं होती। उत्तर प्रदेश के जौनपुर के रहने वाले युवा भाला फेंक खिलाड़ी रोहित यादव ने अपनी मेहनत और जुनून से यह साबित कर दिया है। कभी जेवलिन खरीदने के पैसे नहीं थे, इसलिए बांस के डंडे से अभ्यास शुरू किया। आज वही खिलाड़ी भुवनेश्वर के कलिंगा स्टेडियम में आयोजित 65वीं नेशनल इंटर स्टेट सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 87.05 मीटर का शानदार थ्रो कर देश के शीर्ष भाला फेंक खिलाड़ियों में शामिल हो गया। इस प्रदर्शन के बाद रोहित भारत में नंबर-1 और विश्व रैंकिंग में दूसरे स्थान तक पहुंच गए हैं।
जौनपुर के अदारी डाभिया गांव के रहने वाले 25 वर्षीय रोहित यादव ने प्रतियोगिता में 87.05 मीटर भाला फेंककर शानदार प्रदर्शन किया। इस उपलब्धि के साथ उन्होंने भारत के शीर्ष भाला फेंक खिलाड़ियों में अपनी मजबूत पहचान बनाई। रोहित इससे पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में छठे और विश्व चैंपियनशिप में दसवें स्थान पर भी रह चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने एशियन गेम्स के लिए भी क्वालीफाई किया है। उनकी यह सफलता वर्षों की कड़ी मेहनत, अनुशासन और लगातार बेहतर प्रदर्शन का परिणाम मानी जा रही है।
रोहित की सफलता की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। उनके पिता सभाजीत यादव किसान हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति लंबे समय तक कमजोर रही। शुरुआती दिनों में जेवलिन खरीदने तक के पैसे नहीं थे। ऐसे में रोहित और उनके भाइयों ने बांस के डंडे को ही जेवलिन बनाकर अभ्यास शुरू किया। रोहित के बड़े भाई राहुल यादव बताते हैं कि परिवार ने कभी आर्थिक तंगी को अपने सपनों के बीच नहीं आने दिया। सीमित संसाधनों के बावजूद तीनों भाइयों ने लगातार अभ्यास किया और धीरे-धीरे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बनाई।
रोहित यादव अकेले नहीं, बल्कि पूरा परिवार खेल से जुड़ा हुआ है। बड़े भाई राहुल यादव भी भाला फेंक खिलाड़ी हैं और गांव के बच्चों को प्रशिक्षण देते हैं। वहीं सबसे छोटे भाई रोहन यादव भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुके हैं। रोहित की यह उपलब्धि सिर्फ जौनपुर ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश और देश के लिए गर्व का विषय है। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो, तो संसाधनों की कमी भी सफलता की राह नहीं रोक सकती। बांस के डंडे से शुरू हुआ यह सफर आज देश के नंबर-1 भाला फेंक खिलाड़ी बनने तक पहुंच चुका है।
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