
गांव की गलियों में अब बदलाव साफ दिखने लगा है। जहां कभी रोजगार की कमी और पैसों की तंगी सबसे बड़ी चिंता होती थी, वहीं अब कई महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी होकर नई पहचान बना रही हैं। बरेली जिले के बिथरी चैनपुर ब्लॉक की ग्राम पंचायत उडला जागीर की रहने वाली सलमा इसी बदलाव की मजबूत मिसाल हैं।
सलमा ने बीए की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई खत्म होते ही उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था, अब आगे क्या? परिवार में माता-पिता, एक भाई और एक बहन हैं। पिता ऑटो चलाकर घर चलाते थे। आमदनी कम थी और खर्च ज्यादा। बड़ी मुश्किल से घर चलता था। नौकरी की तलाश में सलमा ने कई कोशिशें कीं, लेकिन जब सफलता नहीं मिली तो वह निराश रहने लगीं।
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इसी दौरान राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूह से जुड़ी उनकी मां को ब्लॉक स्तर पर “बीसी सखी” योजना की जानकारी मिली। यह पहल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार द्वारा शुरू की गई, जिसका मकसद ग्रामीण महिलाओं को बैंकिंग सेवाओं से जोड़कर आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है।
सलमा ने इस मौके को पहचाना। 14 सितंबर 2021 को उन्होंने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर आवेदन किया। छह दिन का प्रशिक्षण लिया, परीक्षा पास की और बीसी सखी के रूप में चयनित हो गईं।
काम शुरू करने के लिए उन्हें 75,000 रुपये का सपोर्ट फंड मिला। इसके बाद आरसेटी से प्रशिक्षण लेकर उन्होंने अपने गांव में ही बीसी सखी सेंटर खोल लिया।
आज सलमा हर महीने करीब 35,000 रुपये तक कमीशन कमा रही हैं। जिस घर में कभी पैसों की कमी थी, वहां अब स्थिर आय है और भविष्य को लेकर भरोसा भी।
सलमा के सेंटर पर अब गांव के लोग पैसे जमा करने और निकालने आते हैं। पहले बैंक जाने के लिए शहर तक जाना पड़ता था और घंटों लाइन में लगना पड़ता था। अब गांव में ही आसान बैंकिंग सुविधा मिल रही है।
वह आधार आधारित भुगतान, पेंशन, बीमा और सरकारी योजनाओं की जानकारी भी देती हैं। अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना में लोगों का पंजीकरण भी कराती हैं।
सुबह आठ बजे से शाम छह बजे तक वह ग्राम पंचायत में वित्तीय सेवाएं देती हैं। इससे गांव में डिजिटल लेनदेन बढ़ा है और लोगों में बचत की आदत भी मजबूत हुई है।
आज सलमा सिर्फ अपने परिवार की मदद नहीं कर रहीं, बल्कि पूरे गांव के लिए मिसाल बन गई हैं। महिलाएं उनसे प्रेरणा ले रही हैं और स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने में रुचि दिखा रही हैं। उनकी कहानी दिखाती है कि अगर सही योजना और सही मार्गदर्शन मिल जाए तो गांव की बेटियां भी आर्थिक बदलाव की अगुआ बन सकती हैं।
सलमा की सफलता यह बताती है कि सरकारी योजनाएं जमीन पर असर डाल रही हैं। महिला सशक्तीकरण अब सिर्फ नारे तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव-गांव में उसकी तस्वीर बदल रही है। सलमा को अपने संघर्ष पर नहीं, अपनी मेहनत और उपलब्धि पर गर्व है। उनकी पहचान अब एक बेरोजगार युवती की नहीं, बल्कि एक आत्मनिर्भर बैंक सखी की है।
यह कहानी साबित करती है कि जब नीति, अवसर और हिम्मत साथ आ जाएं, तो गांव की बेटी भी विकास की नई कहानी लिख सकती है।
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