कौन थीं सरला माहेश्वरी और उनके काम में क्या था खास? दूरदर्शन की आइकॉन न्यूज़रीडर का निधन

Published : Feb 13, 2026, 07:24 AM ISTUpdated : Feb 13, 2026, 07:28 AM IST

Breaking Legacy News: क्या आपको याद है वो शांत आवाज़, जो बिना शोर के देश को ख़बरें सुनाती थी? 80 के दशक की DD न्यूज़रीडर सरला माहेश्वरी नहीं रहीं। क्या आज की टीवी न्यूज़ दुनिया उस गरिमा और भरोसे को फिर पा सकेगी?

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नई दिल्ली। 1980 के दशक में जब टीवी पर सिर्फ एक ही चैनल होता था और पूरा देश एक साथ ख़बरें देखता-सुनता था, उस दौर में सरला माहेश्वरी की आवाज़ हर घर में गूंजती थी। साफ़ उच्चारण, शांत लहजा और गरिमापूर्ण अंदाज़-यही उनकी पहचान थी। गुरुवार को 74 वर्ष की उम्र में उनके निधन की खबर ने उस पूरे दौर की यादें फिर से ताज़ा कर दीं।

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सरला माहेश्वरी इतनी खास क्यों थीं?

आज के शोर-शराबे वाले टीवी न्यूज़ के दौर में यह सवाल बार-बार उठता है कि पहले की न्यूज़रीडिंग अलग क्यों लगती थी। सरला माहेश्वरी इसलिए खास थीं क्योंकि वह खबर को चिल्लाकर नहीं, समझाकर पढ़ती थीं। उनकी हिंदी सरल, शुद्ध और सहज होती थी, जिसे हर उम्र का दर्शक आसानी से समझ पाता था।

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दूरदर्शन से BBC तक का सफर कैसे शुरू हुआ?

सरला ने 1976 में दूरदर्शन जॉइन किया। उस समय उनका नाम सरला जरीवाला था। दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी और गुजराती साहित्य पर PhD करते हुए उन्होंने DD के लिए आवेदन किया और चुन ली गईं। 1980 के दशक में वह उन चुनिंदा चेहरों में शामिल हो गईं, जिन्हें पूरा देश पहचानता था। शादी के बाद जब वह इंग्लैंड गईं, तो उन्होंने BBC Television के लिए भी काम किया-यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी।

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क्या सिर्फ तारीफ़ ही मिली या मुश्किलें भी आईं?

सरला को दर्शकों का प्यार तो मिला ही, लेकिन मुश्किल दौर भी देखने पड़े। 1980 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के समय उन्हें धमकियां भी मिलीं। इसके बावजूद उन्होंने कभी घबराहट नहीं दिखाई और पूरी पेशेवर ईमानदारी के साथ न्यूज़ पढ़ती रहीं।

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प्रेशर में भी कैसे बनी रहीं प्रोफेशनल?

टेलीप्रॉम्प्टर से पहले के ज़माने में न्यूज़ पढ़ना आसान नहीं था। एक बार कैमरा गलती से किसी और न्यूज़रीडर पर चला गया, लेकिन सरला ने बिना घबराए थोड़ी देर रुककर खबर पढ़ी। दर्शकों को गलती का अहसास तक नहीं हुआ। यही उनकी तेज़ सोच और अनुभव को दिखाता है।

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आज लोग उन्हें क्यों याद कर रहे हैं?

आज जब टीवी न्यूज़ बहस, शोर और आरोप-प्रत्यारोप तक सिमट गया है, तब लोग सरला माहेश्वरी जैसे न्यूज़रीडर्स को इसलिए याद करते हैं क्योंकि उन्होंने न्यूज़ को विश्वास और गरिमा दी। उनकी गुजराती साड़ियों का सादा स्टाइल, शांत चेहरा और संतुलित आवाज़-सब कुछ मिलकर DD की उस सकारात्मक छवि को बनाता था, जिसे आज भी लोग याद करते हैं।

एक दौर का अंत, लेकिन यादें हमेशा ज़िंदा

सरला माहेश्वरी का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस दौर का विदा होना है जब न्यूज़ भरोसे का दूसरा नाम हुआ करती थी। उनकी आवाज़ भले अब टीवी पर न गूंजे, लेकिन भारतीय टेलीविज़न के इतिहास में उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा।

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