
नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक बार फिर न्यायपालिका के भीतर बैठी रूढ़िवादी और असंवेदनशील सोच पर कड़ा प्रहार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट के हालिया फैसलों पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए जजों को अपनी जिम्मेदारी और कानूनी रिसर्च के प्रति संवेदनशील होने की कड़ी हिदायत दी है। सुप्रीम कोर्ट की यह नाराजगी उस वक्त खुलकर सामने आई, जब अदालतों द्वारा महिलाओं के खिलाफ हुए जघन्य यौन अपराधों की परिभाषा को तकनीकी बारीकियों में उलझाकर कमतर आंकने की कोशिश की गई।
पूरा विवाद तब गहराया जब पटना हाई कोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने एक आरोपी की 'बलात्कार के प्रयास' (Attempt to Rape) की सजा को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसकी छाती दबाना बलात्कार की कोशिश साबित करने के लिए काफी नहीं है। अदालत का मानना था कि इन हरकतों को केवल महिला की मर्यादा भंग करने (Outraging Modesty - IPC 354) के दायरे में ही रखा जा सकता है, न कि बलात्कार के प्रयास (IPC 376/511) के गंभीर अपराध के तहत, जिसमें बहुत सख्त और लंबी सजा का प्रावधान है। हाई कोर्ट के इस तर्क ने पूरे देश के कानूनविदों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं को हैरान कर दिया।
यह सनसनीखेज मामला साल 2008 का है, जब एक युवती अपने पिता के साथ अमरपुर में एक फोटोग्राफी स्टूडियो गई थी। आरोप के मुताबिक, फोटो खींचने के बाद स्टूडियो के मालिक ने चालाकी से लड़की के पिता को कंप्यूटर पर फोटो देखने के बहाने बाहर भेज दिया। इसके तुरंत बाद आरोपी ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया और युवती के साथ जबरदस्ती करने लगा। युवती की चीख-पुकार सुनकर जब पिता दरवाजे की तरफ दौड़े, तब आरोपी वहां से भाग निकला। निचली अदालत ने सबूतों के आधार पर आरोपी को बलात्कार की कोशिश का दोषी माना था, लेकिन हाई कोर्ट ने मेडिकल सबूतों की कमी और 'पेनिट्रेशन' की कोशिश का प्रत्यक्ष प्रमाण न होने की बात कहकर सजा को बेहद हल्का कर दिया।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान पटना हाई कोर्ट के इस आदेश की ओर दिलाया। उन्होंने कहा कि इस तरह की टिप्पणियां समय-समय पर सामने आती रहती हैं और यह न्यायिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल उठाती हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या पटना हाई कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से जुड़े उस मामले में सर्वोच्च अदालत द्वारा दिए गए निर्देशों का संज्ञान लिया था, जिसमें जजों को यौन अपराधों के मामलों में अधिक संवेदनशील होने की आवश्यकता बताई गई थी। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायाधीशों की यह जिम्मेदारी है कि वे ऐसे मामलों में उपलब्ध न्यायिक दिशानिर्देशों और शोध का अध्ययन करें। उन्होंने अदालतों के स्टाफ की भूमिका पर भी नाराजगी जाहिर की।
जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस पर तीव्र आपत्ति जताई। इलाहाबाद हाई कोर्ट के भी एक ऐसे ही पुराने फैसले (जिसमें पजामे की डोरी खींचने और ब्रेस्ट पकड़ने को रेप की कोशिश नहीं माना गया था) का हवाला देते हुए कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की। मुख्य न्यायाधीश ने सख्त लहजे में कहा कि जजों की यह बुनियादी जिम्मेदारी है कि वे संवेदनशील मुद्दों पर फैसला लिखने से पहले उचित कानूनी रिसर्च करें। उन्होंने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, "स्टाफ कुछ नहीं कर रहा है।"
अपील पर सुनवाई करते हुए पटना हाई कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई मेडिकल साक्ष्य नहीं है, जिससे बलात्कार की कोशिश के लिए आवश्यक तत्व सिद्ध हो सकें। अदालत ने यह भी माना कि अभियोजन पक्ष की ओर से जांच अधिकारी की गवाही नहीं हुई और मामला मुख्य रूप से पीड़िता तथा उसके माता-पिता के बयानों पर आधारित था। इन्हीं परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने बलात्कार की कोशिश की सजा रद्द कर दी, लेकिन महिला की मर्यादा भंग करने के अपराध को बरकरार रखा।
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक सुधारात्मक कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि यौन अपराधों के मामलों में जजों की संवेदनशीलता को लेकर 'नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी कमेटी' द्वारा तैयार की गई विशेष रिपोर्ट को तुरंत सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइटों पर अपलोड किया जाए।
न्यायालय ने साफ किया:
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े और स्पष्ट रुख ने साफ कर दिया है कि महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की न्यायिक असंवेदनशीलता या तकनीकी ढिलाई को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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