
Sustainable Development of Ladakh : हर साल लाखों सैलानी लद्दाख की खूबसूरत वादियों, नीली झीलों और बर्फीले पहाड़ों को देखने जाते हैं। लेकिन क्या हम लद्दाख को देखने जा रहे हैं या उसे धीरे-धीरे खत्म कर रहे हैं? 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day 2026) के मौके पर लद्दाख में आयोजित एक खास समिट ने इस कड़वे सच से पर्दा उठा दिया है। लद्दाख में 'Sustainable Development of Ladakh' विषय पर एक सम्मेलन का आयोजन किया गया। सस्टेनेबल लद्दाख इनिशिएटिव फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस समिट में देश-दुनिया के दिग्गजों ने हिस्सा लिया। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा भारतीय पर्यावरण चिंतक और लेखक राजेश कालरा (Rajesh Kalra) के उस भाषण की, जिसने पर्यटन और आधुनिक विकास से उपजे संकट पर चिंता जताया। हाल ही में लद्दाख के सबसे ऊंचे इलाकों में साइकिलिंग का अपना एक्सपीरिएंस शेयर करते हुए उन्होंने कुछ ऐसी बातें कहीं, जो हर सैलानी और सरकार की आंखें खोलने के लिए काफी हैं।
राजेश कालरा ने साफ शब्दों में कहा कि लद्दाख की असली खूबसूरती सिर्फ उसके ऊंचे पहाड़ नहीं हैं, बल्कि वहां का शांत वातावरण, स्थानीय संस्कृति और प्राकृतिक संतुलन है। लेकिन आज यह संतुलन पूरी तरह खतरे में है। उन्होंने बताया कि लद्दाख की स्थायी आबादी मुश्किल से 3 लाख है, लेकिन हर साल आने वाले पर्यटकों की संख्या इससे कई गुना ज्यादा हो चुकी है। पहले लोग सिर्फ गर्मियों में आते थे, लेकिन अब साल के बारह महीने सैलानी पहुंच रहे हैं। नतीजा? इस नाजुक जमीन को सांस लेने या खुद को संभालने का एक दिन का भी समय (Rest Cycle) नहीं मिल रहा है। उन्होंने आगे कहा कि लोग बंद गाड़ियों (SUVs) में शीशे चढ़ाकर, म्यूजिक सुनते हुए पहाड़ों को पार करते हैं। वे लद्दाख को महसूस करने नहीं, बल्कि सिर्फ रील्स और सेल्फी बनाने के लिए वहां जा रहे हैं।
भाषण का सबसे तीखा प्रहार लद्दाख में तेजी से बढ़ रहे 'शहरी लक्जरी कल्चर' पर था। लेह जैसे ठंडे रेगिस्तान में पानी की एक-एक बूंद बेहद कीमती है। यहां पानी मुख्य रूप से ग्लेशियरों, बर्फ और छोटी प्राकृतिक धाराओं पर निर्भर है, जो हर साल समय से पहले सूख रही हैं। उन्होंने कहा, 'आज लद्दाख के नए होटलों में 11,000 फीट की ऊंचाई पर 'हीटेड स्विमिंग पूल' और 24 घंटे गर्म पानी के दावे किए जा रहे हैं। जिन जगहों पर हर लीटर पानी पिघलते ग्लेशियर से उधार लिया गया है, वहां बाथटब लगाए जा रहे हैं! मैदानी इलाकों से ट्रकों में भरकर प्लास्टिक की बोतल बंद पानी पहाड़ों पर लाया जा रहा है। हमने यात्रा (Travel) को केवल अपनी शारीरिक सुविधा (Comfort) समझ लिया है।'
राजेश कालरा ने स्पष्ट किया कि वह लद्दाख को पिछड़ा रखने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं। लद्दाख के मूल निवासियों को भी अच्छी सड़कें, बिजली, स्कूल, अस्पताल और बेहतरीन आमदनी का पूरा हक है। लेकिन विकास (Development) और बदसूरती (Disfigurement) में बहुत बड़ा फर्क होता है। एक विकसित और मजबूत देश वो होता है जो अपनी जगहों की विविधता को बचाकर रखता है, न कि हर खूबसूरत जगह को मुंबई या दुबई जैसा कंक्रीट का जंगल बना दे। विकसित भारत 2047 का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि हमने लद्दाख में कितने नए होटल खड़े किए या कितने स्विमिंग पूल भरे। पैमाना यह होना चाहिए कि क्या साल 2047 में भी लद्दाख वाकई 'लद्दाख' जैसा दिखेगा?
As the world marked World Environment Day today (June 5), the Administration of the Union Territory of Ladakh organised a summit on Sustainable Development of Ladakh.
This is the talk I delivered at the summit.#SustainableLadakh @lg_ladakh @ashishkundra @UN_SDG…— Rajesh Kalra (@rajeshkalra) June 5, 2026
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