
नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय भूचाल आया हुआ है। ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सुलग रही बगावत की चिंगारी अब देश की राजधानी दिल्ली में एक बड़े सियासी धमाके में बदलने के लिए तैयार है। ममता बनर्जी के नेतृत्व को सीधी चुनौती देते हुए बागी सांसद दिल्ली पहुंच चुके हैं। सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सामने होने वाली इस मुलाकात से पहले सियासी गलियारों में सस्पेंस गहरा गया है। क्या ममता बनर्जी का गढ़ ढहने वाला है? या बागी सांसद खुद अपने ही बुने कानूनी जाल में फंसने वाले हैं?
रविवार की शाम जैसे ही बागी सांसदों के विमान दिल्ली के हवाई अड्डे पर उतरे, सियासी पारा अचानक सातवें आसमान पर पहुंच गया। सूत्रों के मुताबिक, सोमवार को स्पीकर ओम बिरला से मिलने से पहले बागी गुट ने दिल्ली में एक गुप्त ठिकाने पर अपनी रणनीति को अंतिम रूप दिया। इस बैठक का मुख्य एजेंडा था-अब तक जुटाए गए सांसदों के हस्ताक्षरों की समीक्षा करना।
इस सस्पेंस को हवा दी बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार के एक बयान ने, जिसने ममता खेमे की नींद उड़ा दी है। काकोली ने बंद दरवाजों के पीछे से संकेत देते हुए कहा, "हम सभी राजा हैं। मैंने पहले 20 सांसदों की बात की थी, लेकिन अब यह संख्या 22 होने जा रही है। कई और बड़े चेहरे हमारे नियमित संपर्क में हैं।" राजनीति के जानकारों के बीच अब सबसे बड़ा सस्पेंस इस बात को लेकर है कि क्या वरिष्ठ टीएमसी नेता सुदीप बंद्योपाध्याय भी इस बगावत की बैकसीट ड्राइविंग कर रहे हैं?
यह लड़ाई सिर्फ संसद के कमरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने एक बेहद आक्रामक कानूनी मोड़ ले लिया है। बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार के बेटे वैद्यनाथ घोष दस्तीदार ने सीधे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के चार दिग्गज नेताओं-महुआ मोइत्रा, कल्याण बनर्जी, सौगत रॉय और सोनाली गुहा को मानहानि का कानूनी नोटिस भेज दिया है। नोटिस में वैद्यनाथ ने उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि उन्होंने बारासात विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए पार्टी का टिकट मांगा था। उन्होंने खुलेआम चुनौती देते हुए 15 दिनों के भीतर सार्वजनिक माफी की मांग की है। इस नोटिस ने यह साफ कर दिया है कि बागी गुट अब समझौते के मूड में बिल्कुल नहीं है और आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार है।
Paragraph 4, Tenth Schedule (Anti-Defection Law) of the Constitution of India. An MP or MLA will LOSE THEIR SEAT or be DISQUALIFIED under anti-defection law UNLESS their original political party MERGES with another party; and
They either:
*Join the new/merged party, or
*Refuse to… pic.twitter.com/lpreoNgY6h— Sagarika Ghose (@sagarikaghose) June 14, 2026
एक तरफ जहां बागी सांसद संख्या बल का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ममता बनर्जी का खेमा बेहद शांत रहकर अपने सबसे बड़े हथियार की धार तेज कर रहा है। टीएमसी की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष और कीर्ति आजाद ने बागी गुट के खिलाफ 'दल-बदल विरोधी कानून' (Anti-Defection Law) का चक्रव्यूह तैयार किया है।
ममता खेमे का तर्क बेहद सीधा और अचूक है। उनका कहना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 4 के तहत, किसी भी सांसद या विधायक की सदस्यता तभी बच सकती है जब उनकी 'मूल राजनीतिक पार्टी' का किसी दूसरी पार्टी में विलय हो जाए। सदन के भीतर अपनी ही पार्टी से अलग होकर एक स्वतंत्र 'गुट' या 'असली पार्टी' के रूप में काम करने का कोई संवैधानिक प्रावधान ही नहीं बचा है। कीर्ति आजाद ने साफ चेतावनी दी है कि भले ही दो-तिहाई सांसद अलग हो जाएं, लेकिन पार्टी सिर्फ चुनींदा नेताओं से नहीं बनती; संगठन का विलय न होने की स्थिति में सभी बागियों को अयोग्य घोषित होना ही पड़ेगा।
इस पूरे मामले में असली सस्पेंस संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) को लेकर है। साल 2003 से पहले, कानून के पैरा 3 के तहत अगर किसी पार्टी के एक-तिहाई (1/3) सांसद या विधायक अलग होते थे, तो उन्हें 'विभाजन' (Split) के नाम पर अयोग्यता से छूट मिल जाती थी। लेकिन 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के जरिए इस प्रावधान को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। अब कानून कहता है कि अयोग्यता से बचने का एकमात्र रास्ता 'विलय' (Merge) है, जिसके लिए कम से कम दो-तिहाई (2/3) विधायी सदस्यों की सहमति अनिवार्य है। यानी, बागी सांसद खुद को 'असली टीएमसी' कहकर अलग गुट की मान्यता नहीं मांग सकते; कानूनन उन्हें किसी अन्य दल में शामिल होना ही होगा।
सोमवार को जब बागी सांसद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कक्ष में प्रवेश करेंगे, तो देश की नजरें संसद भवन पर टिकी होंगी। क्या बागी सांसद देश के इस सबसे कड़े कानून की कमियों को ढूंढ निकालने में कामयाब रहे हैं? क्या उनके पास वाकई दो-तिहाई का वो जादुई आंकड़ा मौजूद है जो ममता बनर्जी को बैकफुट पर धकेल दे? सोमवार की यह बैठक तय करेगी कि पश्चिम बंगाल की सत्ता का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में रहेगा।
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