बुर्का पहनी इस मुस्लिम लड़की ने उठाया कावड़, भड़क गए बरेली के मौलाना, कहा...

Published : Feb 17, 2026, 01:42 PM IST

Muslim women Kanwar Yatra video: बुर्का पहने दो मुस्लिम महिलाओं का कांवड़ यात्रा से जुड़ा वीडियो वायरल होने के बाद धार्मिक बहस तेज हो गई है। बरेली से मौलाना शहाबुद्दीन रजबी का बयान सामने आया। जानें शरियत और सामाजिक दृष्टिकोण से पूरा मामला।

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बुर्का पहनकर कांवड़ यात्रा? वायरल वीडियो पर धार्मिक बहस तेज, मौलाना शहाबुद्दीन रजबी का बयान

धर्म और व्यक्तिगत पहचान से जुड़े मुद्दे अक्सर निजी आस्था की सीमाओं को पार कर सार्वजनिक बहस का रूप ले लेते हैं। इन दिनों सोशल मीडिया पर एक ऐसा ही वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें दो मुस्लिम महिलाएं बुर्का पहने कांवड़ उठाए दिखाई दे रही हैं। दावा किया जा रहा है कि वे शिव मंदिर में जलाभिषेक के लिए जा रही थीं।

वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बता रहे हैं, तो वहीं कई यूजर्स धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, वीडियो की प्रामाणिकता और स्थान की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आई है।

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बरेली से आया धार्मिक संगठन का बयान

इस मामले में बरेली से ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजबी का बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि बुर्का पहने महिलाओं के कांवड़ यात्रा में शामिल होने का मुद्दा सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग शरियत के नजरिये से इसका हुक्म जानना चाहते हैं।

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शरियत के हवाले से क्या कहा गया?

मौलाना रजबी ने अपने बयान में कहा कि इस्लाम में शरियत की रोशनी में मुसलमान—चाहे पुरुष हो या महिला—दूसरे मजहब के धार्मिक त्योहारों या अनुष्ठानों को नहीं अपना सकता। उनके मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरी कौम की धार्मिक पहचान या तौर-तरीकों को अपनाता है, तो उसकी गिनती उसी कौम में की जा सकती है। उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा में भाग लेना या जलाभिषेक जैसे धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होना मुसलमानों के लिए नाजायज है।

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समुदाय से की अपील

मौलाना ने संबंधित महिलाओं और मुस्लिम समाज से अपील की कि ऐसे कदम न उठाए जाएं जिससे समुदाय की छवि प्रभावित हो। उन्होंने कहा कि गुनाह से बचना और तौबा करना बेहतर रास्ता है तथा भविष्य में इस तरह की गतिविधियों से परहेज किया जाना चाहिए।

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सामाजिक परिप्रेक्ष्य: आस्था बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता

धार्मिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे बहुधर्मी समाज में व्यक्तिगत आस्था और धार्मिक पहचान के प्रश्न संवेदनशील होते हैं। कई बार ऐसे वीडियो सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल के तौर पर देखे जाते हैं, तो कई बार वे परंपरागत धार्मिक व्याख्याओं के साथ टकराव भी पैदा करते हैं।

कानूनी दृष्टि से, जब तक किसी गतिविधि से कानून-व्यवस्था प्रभावित न हो, किसी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता संविधान के तहत संरक्षित है। हालांकि, सामाजिक और धार्मिक संगठनों की अपनी-अपनी व्याख्याएं और दिशानिर्देश होते हैं।

वायरल वीडियो ने एक बार फिर धर्म, पहचान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक ओर इसे सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जा रहा है, तो दूसरी ओर धार्मिक मर्यादाओं की कसौटी पर परखा जा रहा है।

फिलहाल, आधिकारिक स्तर पर वीडियो की पुष्टि और परिस्थितियों की स्पष्ट जानकारी सामने आना बाकी है। ऐसे संवेदनशील मामलों में तथ्यों की पुष्टि और संयमित प्रतिक्रिया ही समाज के लिए हितकारी मानी जाती है।

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