"हे इंद्र देव, अब तो बारिश करवा दो..." वाराणसी में बारिश बुलाने के लिए ये क्या करने लगे लोग?

Published : Jun 16, 2026, 07:00 PM IST
Varanasi Musicians Perform Raga Megh To Pray For Rain Amid Scorching Heat

सार

Kashi Rain Prayer: काशी के रीवा घाट पर बारिश की कामना को लेकर कौन-सा विशेष अनुष्ठान किया गया? भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग मेघ का क्या महत्व माना जाता है? पंडित महेंद्र प्रसन्ना और उनकी टीम ने इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए क्या प्रस्तुति दी?

Raga Megh Varanasi: ज्येष्ठ और आषाढ़ की तपती दोपहरों ने इस बार वाराणसी समेत पूरे पूर्वांचल को झुलसा दिया है। तेज धूप, उमस और लगातार बढ़ते तापमान ने लोगों की दिनचर्या को प्रभावित कर दिया है। ऐसे में धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में बारिश की कामना को लेकर एक अनूठी पहल देखने को मिली, जहां श्रद्धा, संगीत और परंपरा का अद्भुत संगम नजर आया।

काशी के ऐतिहासिक रीवा घाट पर कलाकारों और संगीत साधकों ने भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए विशेष सांस्कृतिक अनुष्ठान का आयोजन किया। इस आयोजन का उद्देश्य केवल वर्षा की कामना करना नहीं था, बल्कि सदियों पुरानी उस सांस्कृतिक परंपरा को जीवित रखना भी था, जिसमें संगीत को ईश्वर तक पहुंचने का माध्यम माना जाता है।

गंगा पूजन के साथ हुई विशेष अनुष्ठान की शुरुआत

सुबह के शांत वातावरण में सबसे पहले मां गंगा का विधिवत पूजन-अर्चन किया गया। कलाकारों ने गंगा मैया को पारंपरिक पीयरी अर्पित कर लोककल्याण और समय पर अच्छी वर्षा की प्रार्थना की। घाट पर मौजूद श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने भी इस विशेष आयोजन में भाग लिया। पूजा-पाठ और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा।

राग मेघ के सुरों से बादलों को दिया गया आमंत्रण

इस अनुष्ठान की सबसे खास कड़ी रही शास्त्रीय संगीत का आयोजन। काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रसिद्ध शहनाई वादक पंडित महेंद्र प्रसन्ना और उनकी टीम ने शहनाई पर राग मेघ का वादन किया। भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग मेघ का विशेष महत्व माना जाता है। लोकमान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार यह राग वर्षा ऋतु और बादलों से जुड़ा हुआ है। इसी विश्वास के साथ कलाकारों ने सुरों के माध्यम से इंद्र देव से वर्षा की कामना की। संगीत प्रेमियों का मानना है कि शास्त्रीय राग केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होते, बल्कि प्रकृति और मानवीय भावनाओं के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करते हैं।

“इंद्र बरसो रे काशी नगरिया” की गूंज से भक्तिमय हुआ माहौल

राग मेघ के वादन के बाद कलाकारों ने पारंपरिक भजनों और शास्त्रीय प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू किया। शहनाई की मधुर धुनों के बीच जब "इंद्र बरसो रे काशी नगरिया" जैसे लोकभावना से जुड़े भजन गूंजे, तो घाट का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया। घाट पर मौजूद लोगों ने इस सांस्कृतिक आयोजन को काशी की जीवंत परंपरा और आध्यात्मिक विरासत का सुंदर उदाहरण बताया।

संकट के समय कला को बनाती है काशी अपनी शक्ति

काशी की पहचान केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रही है। इतिहास गवाह है कि जब-जब शहर ने किसी प्राकृतिक संकट या सामाजिक चुनौती का सामना किया है, तब यहां के कलाकारों, विद्वानों और संतों ने अपनी कला और परंपराओं के माध्यम से समाज को एकजुट करने का प्रयास किया है। चाहे सूखे की स्थिति हो, अत्यधिक गर्मी हो या कोई अन्य प्राकृतिक चुनौती, काशी में संगीत, भक्ति और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए सामूहिक प्रार्थना की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।

बाबा बिस्मिल्लाह खान की विरासत आज भी जिंदा

रीवा घाट पर हुआ यह आयोजन एक बार फिर इस बात का प्रमाण बना कि काशी में शहनाई और शास्त्रीय संगीत की परंपरा आज भी जीवंत है। महान शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने जिस सांगीतिक विरासत को विश्वभर में पहचान दिलाई थी, वही परंपरा आज भी नई पीढ़ी के कलाकारों के माध्यम से आगे बढ़ रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि चाहे मौसम बदले या न बदले, लेकिन ऐसे आयोजन समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम जरूर करते हैं। यही वजह है कि काशी में संगीत केवल कला नहीं, बल्कि आस्था और जीवन का अभिन्न हिस्सा माना जाता है।

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