
Turkey India Relations: भारत और तुर्की के रिश्तों में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। तुर्की के विदेश मंत्री हकान फिदान के हालिया बयान के बाद यह चर्चा और गहरी हो गई है कि क्या तुर्की अब भारत के साथ रिश्तों को नई दिशा देना चाहता है। लेकिन सवाल यह है कि अचानक यह बदलाव क्यों? क्या यह सिर्फ कूटनीतिक भाषा है या इसके पीछे गहरे रणनीतिक कारण हैं? विश्लेषकों के मुताबिक, तुर्की की यह कोशिश एक संतुलन वाली विदेश नीति का हिस्सा है, जहां वह भारत, पाकिस्तान और पश्चिम एशिया के बीच अपने हित साधने की कोशिश कर रहा है। जानिए 5 वजह जिसके कारण तुर्की, भारत के साथ अपने संबध सुधारने की कोशिश कर रहा।
तुर्की इस समय गंभीर आर्थिक दबाव से गुजर रहा है। महंगाई, मुद्रा अस्थिरता और निवेश की कमी ने उसकी विदेश नीति को भी प्रभावित किया है। ऐसे में भारत जैसा बड़ा और तेजी से बढ़ता बाजार तुर्की के लिए बेहद अहम हो गया है।
भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन चुका है। तुर्की अब यहां व्यापार, पर्यटन और टेक्नोलॉजी सेक्टर में अवसर तलाश रहा है। यही वजह है कि अंकारा भारत के साथ टकराव की बजाय सहयोग का रास्ता अपनाने की कोशिश कर रहा है।
तुर्की लंबे समय से पाकिस्तान का रणनीतिक साझेदार माना जाता रहा है, लेकिन अब वह इस रिश्ते को भारत के साथ संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। रक्षा और कूटनीतिक सहयोग के बावजूद अंकारा नहीं चाहता कि भारत के साथ उसके व्यापारिक हित प्रभावित हों।
पूर्वी भूमध्यसागर में तुर्की की प्रतिस्पर्धा ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया जैसे देशों से बढ़ी है। भारत ने हाल के वर्षों में इन देशों के साथ रक्षा और रणनीतिक सहयोग मजबूत किया है। प्रधानमंत्री Narendra Modi की साइप्रस यात्रा और रक्षा समझौतों ने इस समीकरण को और बदल दिया है, जिससे तुर्की पर अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ा है।
तुर्की अब भारत के साथ संवाद बढ़ाकर रक्षा और कूटनीतिक रिश्तों को स्थिर करना चाहता है। हाल के 12वें विदेश कार्यालय परामर्श (FOC) में भी दोनों देशों ने बातचीत का रास्ता खुला रखने पर जोर दिया। यह संकेत है कि अंकारा टकराव की बजाय मैनेज्ड रिलेशन चाहता है।
भारत और तुर्की के संबंध हमेशा सहज नहीं रहे। कई मौकों पर तुर्की ने पाकिस्तान के रुख का समर्थन किया है, खासकर कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी स्थिति भारत के लिए असहज रही है। वहीं भारत ने भी स्पष्ट किया है कि रिश्ते तभी आगे बढ़ सकते हैं जब आपसी संवेदनशीलताओं का सम्मान हो। इसके अलावा पूर्वी भूमध्यसागर विवाद और साइप्रस मुद्दे पर भारत का झुकाव तुर्की के विरोधी देशों की ओर रहा है, जिसने रिश्तों में दूरी बढ़ाई। ऐसे में अब तुर्की का मौजूदा रुख पूरी तरह बदलाव नहीं बल्कि रणनीतिक संतुलन की कोशिश माना जा रहा है। एक तरफ वह पाकिस्तान के साथ पुराने रिश्ते बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ भारत जैसे बड़े आर्थिक साझेदार को भी खोना नहीं चाहता। लेकिन भरोसे की कमी और पुराने विवाद अभी भी इस रिश्ते की सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
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