Akshaya Tritiya Katha: पढ़ें अक्षय तृतीया व्रत की रोचक कथा, श्रीकृष्ण ने स्वयं सुनाई थी युधिष्ठिर को

Published : Apr 19, 2026, 06:00 AM IST
Akshaya Tritiya Katha

सार

Akshaya Tritiya Vrat Katha: अक्षय तृतीया साल में आने वाले 4 अबूझ मुहूर्त में से एक है। इसे स्वयंसिद्ध मुहूर्त भी कहते हैं। इस तिथि से जुड़ी एक कथा भी है जो सभी को सुननी चाहिए। ये कथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी। 

Akshaya Tritiya Story In Hindi: इस बार अक्षय तृतीया का पर्व 19 अप्रैल, रविवार को मनाया जाएगा। धर्म ग्रंथों में इस तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि भगवान विष्णु के तीन अवतार (परशुराम, हयग्रीव और नर-नारायण) इसी दिन प्रकट हुए थे। ऐसा भी कहते हैं कि अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान सूर्य ने द्रौपदी को अक्षय पात्र दिया था। अक्षय तृतीया से जुड़ी एक रोचक कथा हैं। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को ये कथा सुनाई थी। आगे आप भी पढ़ें अक्षय तृतीया की रोचक कथा…

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अक्षय तृतीया व्रत की कथा

प्रचलित कथा के अनुसार, किसी समय महोदय नाम का एक वणिक यानी बनिया एक शहर में रहता था। वह हमेशा सच बोलता था और दूसरों की मदद भी करता था। धर्म-कर्म के कामों में भी वह हमेशा आगे रहता था। एक बार जब महोदय अपने किसी काम से जा रहा था तो उसी मार्ग पर एक ऋषि अक्षय तृतीया का महत्व लोगों को बता रहे थे।

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महोदय ने जब अक्षय तृतीया का महत्व सुना तो वह भी वहीं रुक गया। ऋषि ने महोदय से कहा ‘अक्षय तृतीया पर दान, हवन, पूजन आदि शुभ कामों का अक्षय यानी संपूर्ण फल प्राप्त होता है। इस दिन पितरों के लिए भी अगर कोई दान, हवन, तर्पण आदि किया जाए तो उसका भी शुभ प्राप्त होता है। उसका पुण्य भी कभी खत्म नहीं होता।’
अक्षय तृतीया का महत्व सुनकर महोदय ने सोचा कि वह भी अक्षय तृतीया का व्रत करेगा। समय आने वाले जब अक्षय तृतीया का पर्व आया तो महोदय ने गंगा तट पर अपने पितरों और देवताओं का तर्पण किया। ब्राह्मणों को अनाज, भोजन, कपड़े, दही, दूध जैसी चीजों का दान किया। ऐसा करने से उसे परम सुख का अनुभव हुआ।
समय आने पर महोदय की मृत्यु हो गई। अगले जन्म में उसने कुशावतीपुरी में क्षत्रिय के रूप में जन्म लिया। इस जन्म में भी वह दान-धर्म करके लोगों की मदद करता था। अक्षय तृतीया व्रत करने से ही महोदय से दूसरे जन्म में भी सभी प्रकार के सुख मिले। इस तरह वह जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होकर भगवान के धाम को चला गया।


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