Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha: पाना है भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत का पूरा फल तो जरूर पढ़ें ये कथा

Published : Mar 06, 2026, 08:29 AM IST
Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha

सार

Bhalchandra Sankashti Chaturthi Vrat Katha: इस बार 6 मार्च, शुक्रवार को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाएगा। इस व्रत का का पूरा फल तभी मिलता है जब इसकी कथा सुनी जाए। इस व्रत की कथा भी बहुत रोचक है।

Bhalchandra Sankashti Chaturthi Vrat Katha in Hindi: धर्म ग्रंथों के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। इस चतुर्थी का महत्व अनेक धर्म ग्रंथों में बताया गया है। इस व्रत का महत्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। इस व्रत से जुड़ी एक रोचक कथा भी है। इस कथा को सुनने के बाद ही व्रत का पूरा फल मिलता है। आगे पढ़ें भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूरी कथा…

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भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी की कथा हिंदी में

प्राचीन समय में मयूरध्वज नाम का एक राजा थे, वह बहुत ही धर्मपरायण एवं पराक्रमी थे। उसके राज्य में सभी बहुत सुखी थे। राजा की कोई संतान नहीं थी, इस बात से वह बहुत चिंतित रहते थे। बहुत उपाय करने के बाद राजा मयूरध्वज को एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। पुत्र के साथ थोड़ा समय बिताने के लिए राजा ने अपना सम्पूर्ण राज-पाठ अपने मन्त्री धर्मपाल को कुछ समय के लिए दे दिया।

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मंत्री धर्मपाल भी धर्म पू‌र्वक राजा का प्रतिनिधि बनकर शासन चलाने लगा। कालान्तर में मन्त्री धर्मपाल को पांच पुत्र हुए। समय आने पर उनका विवाह भी हो गया। धर्मपाल की सबसे छोटी बहू भगवान गणेश जी की भक्त थी तथा वह हर चतुर्थी तिथि पर व्रत आदि करती थी। जब उसकी सास ने ये देखा तो उसे लगा कि मेरी पुत्रवधू मेरे पुत्र पर किसी तरह का वशीकरण कर रही है।
सास ने तुरंत अपनी बहू को चतुर्थी तिथि का व्रत-पूजा करने से मना किया। छोटी बहू ने अपनी सास को बहुत समझाया लेकिन वह नहीं मानी। सास के मना करने पर भी बहू ने श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया और प्रार्थना की कि ‘हे पार्वतीनन्दन, कुछ ऐसा कीजिए कि मेरी सास एवं पति के हृदय में आपके प्रति विश्वास जागृत हो सके।’
भगवान श्रीगणेश ने अपने भक्त की पुकार सुनी और अपनी माया से राजा मयूरध्वज के पुत्र युवराज को कहीं छिपा दिया और उसके वस्त्र आदि मन्त्री धर्मपाल के महल में रख दिए। राजा मयूरध्वज को अपने पुत्र को ढूंढने का काफी प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिली। जब सैनिकों ने मंत्री धर्मपाल के महल में राजकुमार के वस्त्र देखें तो ये बात राजा को बताई।
राजा मयूरध्वज को लगा कि मंत्री धर्मपाल ने राज्य के लालच में मेरे पुत्र का अपहरण किया है। राजा को मंत्री धर्मपाल को प्रताड़ित करना शुरू किया। तभी उसकी छोटी बहू ने कहा ‘मेरी सासु मां और पति ने भगवान श्रीगणेश जी का अपमान किया था, इसी वजह से ये मुसीबत आप पर आई है। ’
तब मंत्री धर्मपाल ने बहू से कहा ‘ तुम व्रत-पूजा करके श्रीगणेश को प्रसन्न करो, ताकि हमें इस मुसीबत से छुटकारा मिल सके। बहू के कहने पर पूरे परिवार ने भगवान श्रीगणेश की पूजा आदि की, जिससे राजा मयूरध्वज का पुत्र सकुशल लौट आया। ये देखकर राजा अत्यन्तको बहुत खुशी हुई और अपनी पूरी प्रजा को सदैव चतुर्थी व्रत करने का आदेश दिया।


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इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।

 

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