Bhishm Dwadashi 2026: भीष्म पितामह के कितने भाई थे, पिछले जन्म में उन्हें किसने दिया था श्राप?

Published : Jan 30, 2026, 10:09 AM IST
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सार

Bhishm Dwadashi 2026: इस बार भीष्म द्वादशी 30 जनवरी, शुक्रवार को है। इस दिन भीष्म पितामह के लिए श्राद्ध, तर्पण आदि करने की परंपरा है। ऐसा करने से पितृ दोष कम होता है और शुभ फल मिलते हैं।

Interesting facts about Bhishm Pitamah: भीष्म पितामह महाभारत के सबसे प्रमुख पात्रों में से एक थे। हर साल माघ मास में उन्हीं की स्मृति में भीष्म द्वादशी का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी तिथि पर धर्मराज युधिष्ठिर ने उनका अंतिम संस्कार किया था। भीष्म पितामह से जुड़ी अनेक रोचक बातें महाभारत में बताई गई है जिनके बारे में कम ही लोगों को पता है जैसे भीष्म पितामह पिछले जन्म में कौन थे, उनके भाइयों के नाम क्या थे? भीष्म द्वादशी के मौके पर जानिए भीष्म पितामह से जुड़ी रोचक बातें…

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पिछले जन्म में कौन थे भीष्म पितामह?

धर्म ग्रंथों में जो 33 देवता बताए गए हैं, उनमें 8 वसु भी हैं। इन आठ वसुओं में एक का नाम द्यौ है। भीष्म पितामह द्यौ नाम के वसु देवता थे। एक बार सभी वसुओं ने मिलकर ऋषि वशिष्ठ की गाय को चुरा लिया, जिसे क्रोधित होकर उन्होंने वसुओं को धरती पर जन्म लेने का श्राप दे दिया। बाद में माफी मांगने पर ऋषि वशिष्ठ ने द्यौ नाम के वसु को छोड़कर अन्य सभी को जल्दी ही मृत्यु लोक से मुक्ति पाने का वरदान दे दिया। ये सभी वसु गंगा पुत्र के रूप में जन्में। 7 वसुओं को तो गंगा ने नदी में प्रवाहित कर श्राप मुक्त कर दिया लेकिन द्यौ नाम के वसु भीष्म के रूप में लंबे समय तक धरती पर रहे। श्राप के कारण ही वे आजीवन अविवाहित और नि:संतान रहे।

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कौन थे भीष्म पितामह के भाई?

भीष्म के पिता राजा शांतनु का दूसरा विवाह सत्यवती से हुआ जिससे उन्हें 2 पुत्र हुए। इनके नाम थे चित्रांगद और विचित्रवीर्य। राजा शांतनु की मृत्यु के बाद भीष्म ने चित्रांगद को राजा बनाया लेकिन कम उम्र में ही वह अपने शत्रुओं द्वारा मारा गया। इसके बाद भीष्म ने विचित्रवीर्य को राजा बनाया। लेकिन बीमारी के कारण उनकी मृत्यु भी जल्दी हो गई।

कितने दिन बाणों की शैया पर रहे भीष्म पितामह?

महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह 58 दिनों तक बाणों की शैय्या पर रहे। जिस समय वे घायल हुए थे, जब सूर्य दक्षिणायन था। भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतिक्षा की और इस दौरान पांडवों को राज धर्म की शिक्षा भी दी। जब उन्होंने देखा कि सूर्य उत्तरायण हो चुके हैं और हस्तिनापुर सुरक्षित हाथों में है तब जाकर उन्होंने अपने प्राण त्यागे।


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