Gudi Padwa 2026 Kab Hai: 19 या 20 मार्च, जानें क्या है गुड़ी पड़वा की सही डेट?

Published : Feb 23, 2026, 10:11 AM IST

Gudi Padwa 2026 Date: धर्म ग्रंथों के अनुसार हिंदू नववर्ष की शुरूआत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंदू नववर्ष अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा कहते हैं।

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जानें गुड़ी पड़वा से जुड़ी खास बातें

History Of Gudi Padwa: गुड़ी पड़वा हिंदुओं के सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक है। वैसे तो ये पर्व पूरे देश में मनाया जाता है लेकिन इसकी सबसे ज्यादा रौनक महाराष्ट्र में देखने को मिलती है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि पर मनाया जाने वाला ये त्योहार हिंदुओं के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक भी है। इसी दिन से हिंदू नववर्ष विक्रम संवंत की शुरूआत होती है। जानें इस बार गुड़ी पड़वा उत्सव कब मनाया जाएगा और इससे जुड़ी अन्य खास बातें…


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कब है गुड़ी पड़वा 2026?

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. प्रवीण द्ववेदी के अनुसार साल 2026 में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 19 मार्च, गुरुवार की सुबह 06:53 से शुरू होगी जो 22 मार्च, शुक्रवार की सुबह 04:52 तक रहेगी। इसलिए इसी दिन यानी 19 मार्च को गुड़ी पड़वा का पर्व मनाया जाएगा। दक्षिण भारत में इस दिन हिंदू नववर्ष उगादि के नाम से मनाया जाएगा। चैत्र नवरात्रि की शुरूआत भी इसी दिन से होगी।


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कौन-सा हिंदू वर्ष शुरू होगा गुड़ी पड़वा से?

विद्वानों के अनुसार 19 मार्च 2026 यानी गुड़ी पड़वा से विक्रम संवंत 2083 की शुरूआत होगी। इस हिसाब से देखें तो हिंदू कैलेंडर अंग्रेजी कैलेंडर से 57 साल आगे चल रहा है। विक्रम संवंत की शुरूआत उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने की थी यानी तब तक अंग्रेजी कैलेंडर प्रचलन में आया ही नहीं था। राजा विक्रमादित्य ने शको को पराजित कर भारत से बाहर निकाल दिया था। इसी खुशी में विक्रम संवंत शुरू हुआ था।

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गुड़ी पड़वा क्यों मनाते हैं?

मान्यता है कि गुड़ी पड़वा उत्सव मनाने की शुरूआत छत्रपति शिवाजी महाराज ने शुरू की थी। जिस समय भारत में मुगलों का राज था, उस दौरान छत्रपति शिवाजी महाराज मुगलों को टक्कर दे रहे थे। उन्होंने मुगलों से युद्ध कर कईं किलों पर अपना आधिपत्य कर लिया था। मुगलों पर मिली बड़ी जीत की खुशी में ही सबसे पहले महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा का उत्सव मनाया गया। बाद में ये पर्व पूरे देश में मनाया जाने लगा। छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा शुरू की गई ये परंपरा आज भी जारी है।


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इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।

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