Mahashivratri kab hai: हर साल फाल्गुन मास में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 15 फरवरी, रविवार को है। इस पर्व को मनाने से जुड़ी कईं मान्यताएं हैं। इनमें से एक ये भी है कि ये पर्व शिव-पार्वती के विवाह उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
Mahashivratri Myth And Facts: फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर हर साल महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। ये शैव भक्तों का सबसे बड़ा त्योहार है। इस दिन देश के सभी शिव मंदिरों में विशेष साज-सज्जा की जाती है। महादेव के दर्शनों के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ती है। महाशिवरात्रि उत्सव क्यों मनाते हैं, इसे लेकर भी कईं मान्यताएं हैं। ऐसा कहते हैं कि महाशिवरात्रि शिव-पार्वती के विवाह उत्सव का प्रतीक है। लेकिन कुछ विद्वान इस मान्यता का खंडन करते हैं। आगे जानिए क्या है इस मान्यता का सच…
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. प्रवीण द्विवेदी के अनुसार, वर्तमान में अनेक स्थानों पर महाशिवरात्रि पर्व शिव-पार्वती के विवाह उत्सव के रूप में मनाया जाता है जो कि पूरी तरह से गलत है। शिव-पार्वती का विवाह किस तिथि पर हुआ था, इसके बारे में शिव महापुराण में बताया गया है। उसके अनुसार मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को सोमवार के दिन शिव-पार्वती विवाह हुआ था। उस समय चंद्र, बुध लग्र में थे और रोहिणी नक्षत्र था।
देवी पार्वती से विवाह से पूर्व महादेव का विवाह देवी सती से हुआ था। देवी सती प्रजापति दक्ष की पुत्री थी। देवी सती ने अपने पिता दक्ष की इच्छा के विरुद्ध महादेव से विवाह किया था। शिवपुराण की मानें तो शिव-सती का विवाह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रविवार के दिन पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में हुआ था। यानी शिव-सती विवाह का भी महाशिवरात्रि से कोई संबंध नहीं है।
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क्यों मनाते हैं महाशिवरात्रि?
अगर महाशिवरात्रि शिव-पार्वती के विवाह का उत्सव नहीं है तो फिर ये पर्व क्यों मनाते हैं। उसका उत्तर भी शिव महापुराण में ही लिखा है। उसके अनुसार एक बार ब्रह्मा और विष्णु स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने गए। तभी वहां एक विशाल अग्नि लिंग प्रकट हुआ। ये अग्नि लिंग शिव का ही स्वरूप था। उस दिन फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि थी। महादेव के पहली बार लिंग रूप में प्रकट होने के कारण ही इस दिन महाशिवरात्रि पर्व मनाने की परंपरा शुरू हुई।
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