Pradosh Vrat 2026: सोम प्रदोष 16 मार्च को, कैसे करें पूजा? जानें विधि-मंत्र और मुहूर्त

Published : Mar 15, 2026, 03:30 PM IST
Pradosh Vrat 2026

सार

Pradosh Vrat March 2026: विक्रम संवत 2082 का अंतिम प्रदोष व्रत मार्च में किया जाएगा। इस दिन कईं शुभ योग भी बनेंगे, जिससे इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है। प्रदोष व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।

Ravi Pradosh Vrat March 2026 Shubh Muhurat: मार्च 2026 में सोम प्रदोष का शुभ योग 16 तारीख को बन रहा है। इस दिन चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि दिन भर रहेगी। इस व्रत में भगवान शिव की पूजा शाम को की जाती है, इसलिए इसे प्रदोष व्रत कहते हैं। प्रदोष व्रत सोमवार को होने से ये सोम प्रदोष कहलाएगा। इस दिन और भी कईं शुभ योग बनेंगे जिससे इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है। आगे जानिए प्रदोष व्रत की पूजा विधि, मंत्र व मुहूर्त सहित पूरी डिटेल…

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16 मार्च 2026 प्रदोष व्रत पूजा शुभ मुहूर्त

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. प्रवीण द्विवेदी के अनुसार 16 मार्च, सोमवार को प्रदोष व्रत पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शाम 06 बजकर 30 मिनिट से 08 बजकर 54 मिनिट तक रहेगा। यानी पूजा के लिए पूरे 2 घंटे 24 मिनट का समय भक्तों को मिलेगा। इस दिन शिव, सिद्ध, शुभ और अमृत नाम के 4 शुभ योग भी रहेंगे, जिससे इस व्रत का महत्व और भी अधिक माना जाएगा।

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इस विधि से करें रवि प्रदोष व्रत-पूजा

16 मार्च सोमवार की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत-पूजा का संकल्प लें। दिन भर व्रत के नियमों का पालन करें। शुभ मुहूर्त से पहले पूजन सामग्री एक स्थान पर एकत्रित कर लें। सबसे पहले शिवलिंग का अभिषेक शुद्ध जल से, फिर गाय के दूध से और एक बार पुन: शुद्ध जल से करें। फूल, धतूरा और बिल्व पत्र आदि चीजें अर्पित करें। ऊं नम: शिवाय मंत्र का जाप भी करें। भोग लगाकर महादेव की आरती करें। पूजा के बाद अपनी इच्छा अनुसार दान करें और सात्विक भोजन करें। रात में ब्रह्मचर्य का पालन करना जरूरी है।

शिवजी की आरती लिरिक्स हिंदी में

ऊं जय शिव ओंकारा,स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव,अर्द्धांगी धारा॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुराननपञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासनवृषवाहन साजे॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुजदसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखतेत्रिभुवन जन मोहे॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमालामुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारीकर माला धारी॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बरबाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिकभूतादिक संगे॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डलुचक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारीजगपालन कारी॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिवजानत अविवेका।
प्रणवाक्षर मध्येये तीनों एका॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥
लक्ष्मी व सावित्रीपार्वती संगा।
पार्वती अर्द्धांगी,शिवलहरी गंगा॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती,शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन,भस्मी में वासा॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंगा बहत है,गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत,ओढ़त मृगछाला॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ,नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत,महिमा अति भारी॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरतीजो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी,मनवान्छित फल पावे॥
ऊं जय शिव ओंकारा॥

Disclaimer
इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।

 

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