
Ekadashi Kab Hai: इस बार श्राद्ध पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत 17 सितंबर, बुधवार को किया जाएगा। श्राद्ध पक्ष में आने के कारण इस एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। कहते हैं कि जो भी व्यक्ति इस एकादशी का व्रत पूरे विधि-विधान से करता है, उसके पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से इस व्रत की कथा के बारे में कहा है कि ‘इंदिरा एकादशी की कथा सुनने से भी मनुष्य को अनन्त फल की प्राप्ति होती है।’ आगे पढ़ें इंदिरा एकादशी व्रत की कथा…
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सतयुग में इंद्रसेन नाम के एक पराक्रमी राजा थे। वे महिष्मती नाम की एक नगरी पर राज्य करते थे। उनके राज्य में सभी सुखी और संपन्न थे। एक दिन जब राजा इंद्रसेन अपनी सभा में बैठे थे, तभी वहां देवऋषि नारद आए। राजा ने देवऋषि नारद का उचित आदर-सत्कार किया।
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जब राजा इंद्रसेन ने देवऋषि नारद से आने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा ‘पिछले दिनों में जब मैं यमलोक गया तो वहां मैंने आपके पिताजी को बैठे देखा। तुम्हारे पिता महान दानी और धर्मात्मा थे लेकिन एकादशी व्रत भंग होने के कारण वे यमलोक में निवास कर रहे हैं। उन्होंने तुम्हारे लिए एक संदेश भी भेजा है।’
देवऋषि नारद बोले, तुम्हारे पिताजी ने कहा ‘मेरे किसी पूर्व जन्म के पाप के कारण मुझे यमलोक में रहना पड़ रहा है, यदि मेरा पुत्र इंद्रसेन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत करे और उसका फल मुझे दे तो मेरी मुक्ति हो जाएगी और मैं स्वर्गलोक में वास करुंगा।’
देवऋषि नारद के मुख से पिता का संदेश सुन राजा इंद्रसेन को बहुत दुख हुआ और उन्होंने आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत करने का निश्चय किया साथ ही नारदजी से उस व्रत की पूरी विधि भी पूछी। नारदजी ने राजा इंद्रसेन को पूरी विधि बताई और वहां से चले गए।
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी आने पर राजा इंद्रसेन ने अपने पूरे परिवार सहित इंदिरा एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा इंद्रसेन के पिता यमलोक से निकलकर स्वर्ग को चले गये। इस व्रत का कथा को सुनने से भी व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।
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